Monday, September 28, 2026
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पूजा के आरोपों से पलटने तक: आखिर क्या हुआ कि बदल गया बयान? उठे राजनीतिक दबाव के सवाल

विजयराम आजाद
उप सम्पादक मूकनायक।
बिहार के मेगा रोजगार मेले से दिल्ली पहुंची नर्स पूजा कुमारी के मामले ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। पहले सामने आए वीडियो में पूजा ने नौकरी के नाम पर दिल्ली ले जाने, हॉस्टल में रखने, लड़कियों को वीडियो कॉल के जरिए लड़कों के सामने पेश करने और पसंद किए जाने पर 24 घंटे के लिए भेजे जाने जैसे बेहद गंभीर आरोप लगाए। लेकिन कुछ ही समय बाद पूजा ने इन आरोपों से दूरी बना ली और कहा कि उनकी बात को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया तथा उन्होंने किसी प्रकार के यौन शोषण का आरोप नहीं लगाया था। आखिर ऐसा क्या हुआ कि बयान का स्वर बदल गया? क्या यह केवल गलत रिपोर्टिंग का मामला है या इसके पीछे किसी दबाव की संभावना भी जांच का विषय होनी चाहिए?

बिहार के मेगा रोजगार मेले में चयनित नर्स पूजा कुमारी को दिल्ली में नौकरी का नियुक्ति-पत्र मिलने की बात सामने आई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उन्हें GNM नर्स के रूप में ICU नर्स की नौकरी और लगभग 48 हजार रुपये मासिक वेतन का अवसर बताया गया था। रोजगार मेले के मंच पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा नियुक्ति-पत्र दिए जाने के बाद यह मामला तब सुर्खियों में आया जब दिल्ली पहुंचने के बाद पूजा के नाम से एक वीडियो सामने आया। इस वीडियो में उन्होंने ऐसी बातें बताईं, जिन्होंने पूरे रोजगार तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए। वीडियो में पूजा के हवाले से कहा गया कि उन्हें अस्पताल में नौकरी देने के बजाय एक ऐसे हॉस्टल में रखा गया जहां लड़के और लड़कियां दोनों मौजूद थे। उनका आरोप था कि लड़कियों को वीडियो कॉल के जरिए लड़कों के सामने दिखाया जाता था और लड़का जिस लड़की को पसंद करता, उसे 24 घंटे के लिए उसके पास भेजने की व्यवस्था की जाती थी।

पूजा ने यह भी आरोप लगाया था कि उन्होंने इस व्यवस्था का विरोध किया और बार-बार कहा कि उन्हें केवल नर्स की नौकरी चाहिए, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। उनके कथित बयान में कमरे में बंद करने, भूखा रखने और शौचालय साफ कराने जैसी बातें भी सामने आई थीं। इन आरोपों ने स्वाभाविक रूप से यह सवाल खड़ा किया कि आखिर सरकारी रोजगार मेले से नियुक्ति-पत्र लेकर दिल्ली पहुंची एक युवती के साथ वहां क्या हुआ। अगर आरोप सही थे तो यह केवल एक निजी कंपनी का मामला नहीं था, बल्कि यह सवाल भी उठता था कि सरकारी रोजगार मेले में शामिल कंपनी का सत्यापन किसने किया, नियुक्ति के बाद अभ्यर्थी को किसके हवाले किया गया और दूसरे राज्य में भेजे जाने के बाद उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। इसके बाद पूजा कुमारी ने PTI-भाषा से बातचीत में कहा कि उन्होंने ऐसा कोई आरोप नहीं लगाया था और उनकी बातों को तोड़-मरोड़कर तथा गलत संदर्भ में पेश किया गया। उन्होंने कहा कि उनकी शिकायत कंपनी द्वारा तय समय से अधिक काम कराने और रहने की समुचित व्यवस्था न होने को लेकर थी, न कि किसी यौन शोषण को लेकर। यहीं से इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल जन्म लेता है, अगर पहला वीडियो गलत था तो उसमें दिखाई दे रही आवाज और उसमें बताए गए इतने विस्तृत आरोप कहां से आए? और अगर पहला बयान सही था तो बाद में पूजा ने उससे दूरी क्यों बनाई? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों स्थितियों में जांच जरूरी है। यदि पूजा का पहला बयान गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था तो यह पता लगाया जाना चाहिए कि वीडियो किसने बनाया, किसने रिकॉर्ड किया, किसने उसे प्रसारित किया और क्या उसमें संपादन या संदर्भ बदलने की कोशिश की गई। लेकिन यदि पहला बयान पूजा का वास्तविक बयान था और बाद में उन्होंने दबाव में आकर उससे दूरी बनाई, तो यह और भी गंभीर विषय है तथा इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। यही वह जगह है जहां राजनीतिक दबाव की आशंका का सवाल सामने आता है, लेकिन इस समय इसे आरोप के रूप में नहीं बल्कि जांच के सवाल के रूप में देखना चाहिए। क्योंकि नियुक्ति-पत्र जिस सरकारी रोजगार मेले से जुड़ा था और जिस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी मौजूद थे, उसी मामले में सामने आए गंभीर आरोपों के बाद बयान बदलना स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक जांच की मांग करता है। केवल इसलिए कि मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, जांच का सवाल खत्म नहीं हो जाता। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई निर्णायक प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह कहा जा सके कि पूजा पर राजनीतिक दबाव डाला गया। इसलिए बिना प्रमाण यह कहना कि उन्हें मुख्यमंत्री या सरकार की ओर से दबाव दिया गया, पत्रकारिता की दृष्टि से उचित नहीं होगा। लेकिन क्या पुलिस ने इस संभावना की जांच की? क्या पूजा का बयान स्वतंत्र वातावरण में दर्ज हुआ? क्या उनसे किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की मौजूदगी के बिना बात की गई? क्या पहले वीडियो और बाद के बयान की फोरेंसिक जांच हुई? क्या उनके मोबाइल फोन और वीडियो की मूल रिकॉर्डिंग सुरक्षित की गई? ये वे सवाल हैं जिनके जवाब सामने आने चाहिए। मामले की निष्पक्ष जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि पूजा ने दिल्ली जाने से पहले किन लोगों से बात की थी, दिल्ली पहुंचने के बाद किस नंबर से किससे संपर्क किया, उन्हें किसने रिसीव किया, किस स्थान पर रखा गया और फिर पटना लौटने के बाद सबसे पहले उन्होंने किसे अपनी आपबीती बताई। यदि उनके पास फोन था तो उस दौरान की कॉल डिटेल, व्हाट्सऐप चैट, लोकेशन और वीडियो की मूल फाइल जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि पहला बयान स्वेच्छा से दिया गया था या उसके पीछे किसी और व्यक्ति का प्रभाव था। इसी तरह बाद में दिए गए बयान की भी जांच उतनी ही गंभीरता से होनी चाहिए। यदि पूजा ने सचमुच कहा कि उनके साथ केवल अधिक घंटे काम कराने और रहने की खराब व्यवस्था की समस्या थी, तो कंपनी को यह बताना चाहिए कि वह कौन-सी कंपनी थी, दिल्ली में उसका वास्तविक कार्यालय कहां था, नर्स की नौकरी का कार्यस्थल कौन-सा था, उन्हें किस हॉस्टल में रखा गया और निर्धारित काम के घंटे तथा वास्तविक काम के घंटे क्या थे। यदि यह जानकारी सामने आती है तो पहले और बाद के बयानों के बीच मौजूद अंतर को समझना आसान होगा। एक और गंभीर सवाल भर्ती प्रक्रिया को लेकर है। यदि नियुक्ति-पत्र में एक कंपनी का नाम था लेकिन दिल्ली पहुंचने पर अभ्यर्थी को किसी दूसरी संस्था या व्यक्ति के माध्यम से बुलाया गया, जैसा कि कुछ रिपोर्टों में आरोपों के रूप में सामने आया है, तो इस कड़ी की जांच आवश्यक है। आखिर भर्ती किसने की? नियुक्ति किसने की? दिल्ली बुलाने वाला कौन था? और अभ्यर्थी को वास्तविक कार्यस्थल के बजाय किसी दूसरे स्थान पर क्यों ले जाया गया? इन सवालों के जवाब बिना दस्तावेजी जांच के नहीं मिल सकते। यहां ‘कॉल सेंटर’ या भर्ती नेटवर्क की भूमिका की बात भी सामने आती है। यदि युवाओं को पहले फोन करके नौकरी का भरोसा दिया गया, फिर दस्तावेज लिए गए, नियुक्ति-पत्र दिया गया, दूसरे राज्य में बुलाया गया और वहां पहुंचने के बाद किसी दूसरे स्थान पर रखा गया, तो यह पता लगाना जरूरी है कि इस पूरी प्रक्रिया में कितने लोग जुड़े थे। हालांकि उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह निश्चित रूप से कोई संगठित कॉल सेंटर या मानव तस्करी नेटवर्क था। यह जांच का विषय है, निष्कर्ष नहीं। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि पूजा आखिर क्यों पलटीं? क्या उन्हें लगा कि उनके बयान को गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया? क्या उन्हें कानूनी परिणाम का डर लगा? क्या परिवार पर दबाव पड़ा? क्या किसी कंपनी या व्यक्ति ने उन्हें समझाया? क्या किसी सरकारी अधिकारी ने उनसे बात की? क्या राजनीतिक दबाव था? या फिर वास्तव में पहला वीडियो ही गलत संदर्भ में तैयार किया गया था? इन सभी संभावनाओं में से किसी एक को भी अभी तथ्य नहीं माना जा सकता। लेकिन एक स्वतंत्र जांच इन सवालों के जवाब तलाश सकती है। इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम इसलिए सामने आ रहा है क्योंकि नियुक्ति-पत्र वितरण कार्यक्रम में उनकी मौजूदगी थी। लेकिन यह कहना कि पूजा के साथ दिल्ली में कथित रूप से जो कुछ हुआ उसके लिए मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं, उपलब्ध तथ्यों से स्वतः सिद्ध नहीं होता। असली राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल यह है कि जिस रोजगार मेले में निजी कंपनियां अभ्यर्थियों को नौकरी दे रही थीं, उनके चयन और सत्यापन की जिम्मेदारी किसकी थी और नियुक्ति के बाद सरकार ने अभ्यर्थियों की स्थिति जानने की क्या व्यवस्था की थी। यदि सरकार यह दावा करती है कि रोजगार मेले में शामिल कंपनियों का पूरा सत्यापन किया गया था, तो उस सत्यापन की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? यदि कंपनी पूरी तरह सत्यापित थी तो पूजा को नौकरी के निर्धारित स्थान पर पहुंचाने की जिम्मेदारी किसकी थी? और यदि सरकार के पास पोस्ट-प्लेसमेंट मॉनिटरिंग की व्यवस्था थी, तो पूजा की शिकायत सामने आने से पहले सरकार को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली? पूजा का बयान बदलना इस पूरे मामले का अंत नहीं, बल्कि शायद सबसे महत्वपूर्ण जांच-बिंदु है। क्योंकि पहला बयान यदि सही था तो गंभीर अपराध की आशंका है; और यदि पहला बयान गलत था तो किसी युवती के नाम पर गंभीर आरोपों वाला वीडियो प्रसारित करने का मामला सामने आता है। दोनों परिस्थितियों में सच्चाई सामने आना जरूरी है। इसलिए सरकार को चाहिए कि मामले की जांच किसी राजनीतिक प्रभाव से मुक्त स्वतंत्र एजेंसी से कराए। पूजा का बयान स्वतंत्र वातावरण में दोबारा दर्ज हो, दोनों वीडियो और उनकी मूल रिकॉर्डिंग की फोरेंसिक जांच हो, मोबाइल और डिजिटल साक्ष्यों की जांच हो, नियुक्ति-पत्र जारी करने वाली कंपनी की पूरी पृष्ठभूमि खंगाली जाए, दिल्ली के कथित कार्यस्थल और हॉस्टल की जांच हो तथा इसी माध्यम से नौकरी पाने वाले अन्य अभ्यर्थियों से भी स्वतंत्र रूप से पूछताछ की जाए। पूजा का पहला बयान सही था या दूसरा इसका फैसला सोशल मीडिया, राजनीतिक बयानबाजी या टीवी बहस से नहीं हो सकता। इसका फैसला दस्तावेज, डिजिटल साक्ष्य, स्वतंत्र बयान और पुलिस जांच से ही होना चाहिए। लेकिन जनता का सवाल अपनी जगह कायम है, जिस युवती को रोजगार मेले के मंच से नौकरी का भरोसा मिला, वह दिल्ली पहुंचकर पहले इतनी गंभीर बातें क्यों कहती है और फिर कुछ ही समय बाद उन्हीं आरोपों से क्यों पलट जाती है? क्या यह गलत रिपोर्टिंग थी? क्या वीडियो को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया? क्या कंपनी की वास्तविकता कुछ और थी? क्या परिवार या किसी संस्था का दबाव था? या क्या राजनीतिक दबाव की कोई भूमिका थी? इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास अंतिम रूप से नहीं है। और शायद यही कारण है कि इस प्रकरण में सबसे ज्यादा जरूरत किसी पक्ष के पक्ष में खड़े होने की नहीं, बल्कि सच के पक्ष में खड़े होकर निष्पक्ष जांच कराने की है। क्योंकि यदि पूजा सच बोल रही थीं, तो उन्हें न्याय चाहिए। और यदि उनके नाम पर झूठा वीडियो बनाया गया था, तो उन्हें उस झूठ से भी न्याय चाहिए। दोनों परिस्थितियों में सच्चाई सामने आना जरूरी है।

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