रविदास धर्मशाला में कथित बोली लगाकर अध्यक्ष समेत अन्य पदाधिकारी चुनने का आरोप, ट्रस्ट अभी पंजीकृत नहीं; समाज के लोगों ने उठाए चुनाव की पारदर्शिता और अधिकार पर सवाल
महरौनी/ललितपुर। महरौनी के गौतम नगर वार्ड नंबर-02 स्थित संत शिरोमणि रविदास मंदिर/धर्मशाला में अहिरवार समाज के अध्यक्ष एवं अन्य पदाधिकारियों के चयन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। समाज के कुछ लोगों का आरोप है कि धर्मशाला के लिए तत्कालीन समय में आवंटित भूमि और प्रस्तावित ट्रस्ट की व्यवस्था को दरकिनार करते हुए 06 सितंबर 2026 को कथित तौर पर पैसों की बोली लगाकर अध्यक्ष, मंत्री, कोषाध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चयन कर दिया गया। खास बात यह है कि संबंधित ट्रस्ट अभी तक पंजीकृत नहीं हुई है। ऐसे में समाज के लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर बिना पंजीकृत ट्रस्ट के पदाधिकारियों के चयन की यह प्रक्रिया किस नियम और अधिकार के तहत अपनाई गई।
चुनिंदा लोगों को बुलाकर बैठक करने का आरोप
समाज के कुछ लोगों के मुताबिक 06 सितंबर 2026 को रविदास धर्मशाला में अहिरवार समाज की बैठक बुलाई गई थी। आरोप है कि बैठक की सूचना समाज के सभी लोगों को देने के बजाय कुछ चुनिंदा लोगों को ही दी गई। बताया गया कि अध्यक्ष सहित अन्य पदाधिकारियों के चुनाव की सूचना घर-घर पर्चे चिपकाकर तथा समाज के ग्रुपों के माध्यम से देने की बात पहले तय हुई थी। इसके बाद विधिवत चुनाव होना था। लेकिन आरोप है कि बैठक में कुछ लोगों ने अपनी पसंद का अध्यक्ष बनाने के लिए अन्य समाजजनों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया। विरोध करने वाले लोगों ने कुछ व्यक्तियों पर धमकी देने के आरोप भी लगाए हैं।
मतदान के बजाय पैसों की बोली से पद बांटने का आरोप
अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर करीब आठ लोगों की मौजूदगी में कथित तौर पर पैसों की बोली लगाए जाने की बात सामने आई है। समाज के विरोध करने वाले लोगों का आरोप है कि अध्यक्ष पद के साथ मंत्री, कोषाध्यक्ष और उपाध्यक्ष जैसे पदों के लिए भी आर्थिक बोली के आधार पर चयन किया गया। इस प्रक्रिया को लेकर समाज के लोगों का सवाल है कि जब सामाजिक संस्था के पदाधिकारियों का चयन समाज की सहमति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होना चाहिए, तो फिर पदों के लिए धनराशि की बोली लगाने की व्यवस्था किस आधार पर बनाई गई।
तीन नाम सामने आए, 12 हजार की बोली के बाद दिनेश के नाम पर सहमति का आरोप
अध्यक्ष पद के लिए राकेश कुमार, रामप्रसाद सेवानिवृत्त कानूनगो और दिनेश कुमार के नाम सामने आने की बात कही जा रही है। आरोप है कि बोली के दौरान राकेश कुमार ने 12 हजार रुपये तक की बोली लगाई। इसके बाद उन्होंने कथित तौर पर दोनों को चाचा-भतीजा बताते हुए दिनेश कुमार को अध्यक्ष बनाए जाने पर सहमति जताई। विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि यदि अध्यक्ष का चुनाव होना था तो सभी दावेदारों के बीच मतदान कराया जाना चाहिए था। केवल बोली और आपसी सहमति के आधार पर अध्यक्ष घोषित किए जाने से पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।
21 हजार की चर्चा से 1100 रुपये की बोली तक कैसे पहुंचा मामला?
चुनाव प्रक्रिया में धनराशि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। समाज के कुछ लोगों के अनुसार, 30 अगस्त 2026 को अध्यक्ष पद के लिए 21 हजार रुपये से बोली लगाए जाने की चर्चा हुई थी। लेकिन 06 सितंबर को कथित बोली की शुरुआत 1100 रुपये से किए जाने की बात सामने आई। समाज के लोगों का सवाल है कि आखिर दोनों बैठकों के बीच बोली की राशि में इतना अंतर क्यों आया? क्या अध्यक्ष पद का चयन पहले से तय था और बोली की प्रक्रिया केवल औपचारिकता थी? इन सवालों का जवाब संबंधित लोगों और बैठक में मौजूद सदस्यों से मिलना बाकी है।
सात वर्ष पुराने गंभीर आरोप के बावजूद अध्यक्ष बनाए जाने पर सवाल
अध्यक्ष बनाए गए व्यक्ति को लेकर समाज में सबसे गंभीर सवाल करीब सात वर्ष पुराने एक कथित घटनाक्रम को लेकर उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि उस समय उक्त व्यक्ति ने अहिरवार समाज के एक व्यक्ति के मुंह में गंदगी भरने जैसी अमानवीय हरकत की थी। अब विरोध करने वाले समाजजनों का सवाल है कि जिस व्यक्ति पर ऐसा गंभीर आरोप लगाया जा रहा है, उसे समाज का अध्यक्ष कैसे बनाया गया? क्या समाज का मान-सम्मान और सामाजिक मर्यादा आर्थिक प्रभाव से अधिक महत्वपूर्ण नहीं होनी चाहिए? हालांकि इस पुराने आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित व्यक्ति का पक्ष सामने आने के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
सबसे अहम तथ्य, ट्रस्ट अभी तक पंजीकृत नहीं
पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संत शिरोमणि रविदास मंदिर/धर्मशाला से संबंधित ट्रस्ट अभी तक पंजीकृत नहीं हुई है। ऐसे में समाज के लोगों का सवाल है कि जब ट्रस्ट का विधिवत पंजीकरण ही नहीं हुआ, तब उसके अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों के चयन की प्रक्रिया किस वैधानिक आधार पर की गई। समाज के कुछ लोगों का कहना है कि तत्कालीन समय में धर्मशाला के लिए आवंटित भूमि और प्रस्तावित ट्रस्ट की व्यवस्था को लेकर कुछ नियम एवं पदाधिकारियों के चयन की प्रक्रिया तय की गई थी। उनके अनुसार, पदाधिकारियों का चयन व्यक्तियों की सहमति से किए जाने की बात कही गई थी। ऐसे में कथित तौर पर पैसों की बोली लगाकर अध्यक्ष सहित अन्य पदों का चयन किए जाने पर सवाल और गंभीर हो जाता है।
बिना पंजीकृत ट्रस्ट के पदाधिकारियों का चयन किस अधिकार से?
समाज के विरोध करने वाले लोगों का सीधा सवाल है कि जब ट्रस्ट अभी पंजीकृत नहीं हुई है तो अध्यक्ष, मंत्री, कोषाध्यक्ष और उपाध्यक्ष जैसे पदों का गठन किस अधिकार के तहत किया गया? उनका कहना है कि यदि यह केवल समाज की अस्थायी व्यवस्था थी तो सभी समाजजनों की मौजूदगी में पारदर्शी तरीके से पदाधिकारियों का चयन किया जाना चाहिए था। वहीं यदि यह भविष्य में बनने वाले ट्रस्ट की व्यवस्था है तो उसके नियम स्पष्ट किए जाने चाहिए और पंजीकरण के बाद विधिवत प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
अम्बेडकर पार्क की जमीन से जोड़कर भी उठ रहा पुराना विवाद
वर्तमान विवाद के बीच करीब दो वर्ष पुराने डॉ. भीमराव अम्बेडकर पार्क की जमीन से जुड़े विवाद का भी जिक्र किया जा रहा है। आरोप है कि उस समय दिनेश कुमार ने पार्क की जमीन पर कब्जा करवाने अथवा उसे बेचने संबंधी पेशकश विजयराम आजाद के समक्ष की थी। आरोप के अनुसार, विजयराम आजाद ने इसका स्पष्ट रूप से विरोध करते हुए प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। समाज के कुछ लोगों का कहना है कि अम्बेडकर पार्क की जमीन को लेकर विजयराम आजाद लगातार संघर्ष करते रहे हैं और इसी कारण कथित कब्जे अथवा बिक्री का प्रयास सफल नहीं हो सका। हालांकि इस मामले में लगाए गए आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्ष का बयान सामने आना आवश्यक है।
बाबा साहब की लोकतांत्रिक विचारधारा का हवाला
विरोध करने वाले समाजजनों का कहना है कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने लोकतांत्रिक व्यवस्था, समान प्रतिनिधित्व और संवैधानिक प्रक्रिया पर जोर दिया था। ऐसे में किसी सामाजिक संस्था के पदों का कथित तौर पर आर्थिक बोली के आधार पर निर्धारण करना उनकी विचारधारा के अनुरूप नहीं माना जा सकता। उनका कहना है कि समाज के पद प्रतिष्ठा और सेवा के लिए होने चाहिए, न कि धनराशि के आधार पर तय किए जाने चाहिए।
क्या दोबारा होगा विधिवत चुनाव?
पूरे घटनाक्रम के बाद अहिरवार समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि 06 सितंबर को कथित बोली के आधार पर चुने गए अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को मान्यता दी जाएगी या नहीं। समाज के विरोध करने वाले लोगों की मांग है कि धर्मशाला की भूमि से संबंधित दस्तावेज, प्रस्तावित ट्रस्ट के नियम, बैठक की सूचना, बैठक में उपस्थित लोगों की सूची और पदाधिकारियों के चयन की पूरी प्रक्रिया समाज के सामने रखी जाए। साथ ही उनका कहना है कि यदि ट्रस्ट अभी पंजीकृत नहीं हुई है और पदाधिकारियों के चयन की प्रक्रिया में समाज के सभी लोगों की सहमति नहीं ली गई, तो अध्यक्ष सहित सभी पदों का विधिवत एवं पारदर्शी चुनाव कराया जाना चाहिए। अब देखना यह है कि समाज इस कथित बोली आधारित चयन को स्वीकार करता है या फिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत दोबारा चुनाव की मांग पर आगे बढ़ता है।

