विजयराम आजाद
उप सम्पादक मूकनायक।
“जिस प्रदेश में नौकरी मांगने वाले युवा लाठियां खाते हों, शिक्षक वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा में धरने पर बैठे हों, छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर संघर्ष कर रहे हों और दूसरी ओर धार्मिक आयोजनों पर सरकारी सम्मान, पुष्पवर्षा और व्यापक संसाधन दिखाई दें, वहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राज्य की प्राथमिकताएँ आखिर क्या हैं?”
यह किसी धर्म के विरोध का प्रश्न नहीं है। कांवड़ यात्रा करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ी परंपरा है और प्रत्येक नागरिक को संविधान ने अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता दी है। राज्य का दायित्व है कि वह ऐसे आयोजनों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। किंतु उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि वही राज्य रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की मांग करने वाले नागरिकों के प्रति भी समान संवेदनशीलता दिखाए। लोकतंत्र में आस्था और अधिकार—दोनों का सम्मान आवश्यक है।
आज उत्तर प्रदेश में पिछले कई वर्षों के आंदोलनों पर नज़र डालें तो एक समान पीड़ा दिखाई देती है। 69,000 शिक्षक भर्ती से जुड़े अभ्यर्थियों का लंबा संघर्ष, विभिन्न शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के अभ्यर्थियों के धरने, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, नियुक्तियों में देरी, पुलिस भर्ती, आरक्षण से जुड़े आंदोलन, युवाओं के रोजगार प्रदर्शन—इन सबने बार-बार यह प्रश्न उठाया कि क्या युवाओं की आवाज़ सुनने का सबसे आसान उत्तर पुलिस बल है?
69,000 शिक्षक भर्ती का संघर्ष केवल एक भर्ती का विवाद नहीं रहा। यह लाखों युवाओं की आशाओं, वर्षों की मेहनत और न्याय की प्रतीक्षा का प्रतीक बन गया। अभ्यर्थी अदालतों के चक्कर लगाते रहे, धरने देते रहे, ज्ञापन सौंपते रहे। अनेक मौकों पर प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों ने आरोप लगाया कि उनकी बात सुनने के बजाय उनके साथ सख्ती की गई। लोकतंत्र में यह स्थिति चिंता का विषय है, क्योंकि संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार देता है।
केवल शिक्षक ही नहीं, अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी भी समय-समय पर परीक्षा रद्द होने, पेपर लीक, नियुक्तियों में विलंब और पारदर्शिता की कमी को लेकर आंदोलित होते रहे हैं। एक युवा अपने जीवन के पाँच-दस वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा देता है। जब परिणाम अनिश्चित हों और नियुक्तियाँ वर्षों तक लंबित रहें, तो उसके सामने केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक संकट भी खड़ा हो जाता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रश्न भी कम गंभीर नहीं है। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी, डॉक्टरों की कमी, दवाओं की अनुपलब्धता और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की चुनौतियाँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। जब नागरिक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग करते हैं, तो उनकी आवाज़ को प्रशासनिक प्राथमिकता मिलनी चाहिए, क्योंकि स्वस्थ नागरिक ही किसी राज्य की सबसे बड़ी संपत्ति होते हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार—ये तीनों किसी भी आधुनिक समाज की आधारशिला हैं। विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को और विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी मानव पूंजी (Human Capital) होती है। मानव पूंजी का अर्थ है—शिक्षित युवा, स्वस्थ नागरिक, कुशल कार्यबल और नवाचार की क्षमता। जापान, दक्षिण कोरिया, फिनलैंड, जर्मनी और सिंगापुर जैसे देशों ने अपनी प्रगति का आधार शिक्षा, अनुसंधान, कौशल और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बनाया।
समाजशास्त्र बताता है कि राज्य जिन गतिविधियों को अधिक सार्वजनिक सम्मान देता है, समाज भी धीरे-धीरे उन्हें अधिक महत्व देने लगता है। यदि अधिकार मांगने वाले युवाओं की छवि बार-बार कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में बने और धार्मिक आयोजनों को निरंतर सार्वजनिक सम्मान मिले, तो सामाजिक संदेश का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आस्था और अधिकार—दोनों को समान गरिमा प्रदान करे।
एक और गंभीर चिंता आउटसोर्सिंग व्यवस्था को लेकर समय-समय पर उठती रही है। अनेक अभ्यर्थियों और कर्मचारी संगठनों ने आरोप लगाए हैं कि कुछ स्थानों पर अल्पकालिक, लगभग 11 माह के अनुबंध वाली नौकरियों में भी भ्रष्टाचार और अवैध वसूली की शिकायतें होती हैं। विभिन्न मंचों पर लाखों रुपये तक की मांग किए जाने के आरोप भी लगाए गए हैं। इन आरोपों की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच आवश्यक है। यदि आरोप सही हैं, तो यह बेरोजगार युवाओं के साथ अन्याय है; और यदि गलत हैं, तो सरकार का दायित्व है कि वह जांच कर व्यवस्था पर जनता का विश्वास मजबूत करे।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो अस्थायी रोजगार, अनिश्चित भविष्य और लगातार बेरोजगारी किसी भी समाज में आर्थिक स्थिरता नहीं ला सकते। असुरक्षित रोजगार सामाजिक तनाव, मानसिक दबाव और प्रतिभा के पलायन को बढ़ा सकता है। इसके विपरीत, स्थायी और पारदर्शी रोजगार व्यवस्था समाज को स्थिरता देती है।
भारतीय संविधान केवल धार्मिक स्वतंत्रता की बात नहीं करता; वह समान अवसर, गरिमापूर्ण जीवन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक-आर्थिक न्याय की भी बात करता है। इसलिए किसी भी सरकार की सफलता केवल धार्मिक आयोजनों के सफल संचालन से नहीं मापी जानी चाहिए, बल्कि इस बात से भी कि उसने कितनी पारदर्शी भर्तियाँ कीं, कितने युवाओं को रोजगार मिला, कितने विद्यालय और अस्पताल बेहतर हुए और कितने नागरिकों की शिकायतों का समाधान सम्मानपूर्वक किया गया।
लोकतंत्र की असली शक्ति लाठी में नहीं, संवाद में होती है। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं हो सकती कि उसने कितने फूल बरसाए; बल्कि यह होनी चाहिए कि उसके राज्य का कोई भी युवा यह महसूस करे कि उसे नौकरी के लिए वर्षों तक धरना नहीं देना पड़ेगा, न्याय के लिए बार-बार सड़क पर नहीं उतरना पड़ेगा और अपनी आवाज़ उठाने पर उसे सम्मानपूर्वक सुना जाएगा।
उत्तर प्रदेश का भविष्य केवल धार्मिक आयोजनों की भव्यता से तय नहीं होगा। उसका भविष्य उन विद्यालयों से तय होगा जहाँ बच्चे पढ़ेंगे, उन विश्वविद्यालयों से जहाँ शोध होगा, उन अस्पतालों से जहाँ जीवन बचेगा और उन रोजगार कार्यालयों से जहाँ युवाओं को अवसर मिलेगा।
एक विकसित राज्य वही है जहाँ कांवड़ यात्रा भी सुरक्षित हो, शिक्षक भी सम्मानित हों, छात्र भी सुने जाएँ, मरीज भी उपचार पाएँ और बेरोजगार युवा भी यह विश्वास रख सके कि लोकतंत्र में उसे न्याय मिलेगा—लाठी नहीं।

