मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन का अंतिम पड़ाव प्रकृति का वह शाश्वत नियम है, जिससे भागना किसी के लिए संभव नहीं है। बचपन की अबोधता और जवानी के जोश से गुजरने के बाद, वृद्धावस्था जीवन का वह मोड़ है, जहाँ इंसान का खुद पर से नियंत्रण धीरे-धीरे छूटने लगता है। उम्र बढ़ने के साथ हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं, इंद्रियां शिथिल पड़ने लगती हैं और बीमारियां शरीर को घेर लेती हैं। जो हाथ कभी दूसरों को सहारा देते थे, वे खुद का एक गिलास पानी उठाने के लिए भी कांपने लगते हैं। आज के डिजिटल और तेजी से भागते युग में तकनीक और सामाजिक ताना-बाना इतनी तेजी से बदला है कि बुजुर्ग खुद को उसमें ढालने में असमर्थ पाते हैं। बैंक के काम से लेकर डॉक्टर की अपॉइंटमेंट तक, हर छोटी चीज के लिए उन्हें नई पीढ़ी की मदद चाहिए होती है। निर्भरता का यही दर्द और बुढ़ापे की बेबसी है।
कोई भी स्वाभिमानी बुजुर्ग यह नहीं चाहता कि वह अपने बच्चों पर बोझ बने। जिसने पूरी जिंदगी अपनों को पाला-पोसा, उसके लिए अपनों के ही सामने हाथ फैलाना या उन पर आश्रित होना एक गहरे मानसिक और भावनात्मक दर्द को जन्म देता है। यह उनकी इच्छा नहीं, बल्कि गिरते शरीर और बदलती परिस्थितियों की बेबस मजबूरी होती है। बुजुर्गों की यह निर्भरता उनके आत्मसम्मान को चोट न पहुँचाए, यह जिम्मेदारी पूरी तरह बच्चों की है। जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर उन्हें पैसों या भौतिक सुख-सुविधाओं से ज्यादा अपनों के साथ, सम्मान और संवेदनशील व्यवहार की जरूरत होती है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आज जो उनका वर्तमान है, वही हमारा भविष्य है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

