मूकनायक / रिपोर्टर धर्मवीर गौतम / हिंडौन सिटी-करौली
आरक्षित सीट पर दलित मतों का बंटवारा, नगर परिषद चुनाव में निर्दलीयों की बड़ी जीत ने बदले राजनीतिक समीकरण
हिंडौन सिटी। हिंडौन की राजनीति में अनुसूचित जाति, खासकर जाटव समुदाय, लंबे समय से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक कारक रहा है। हिंडौन विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और उपलब्ध चुनावी विश्लेषणों में जाटव मतदाताओं को यहां सबसे बड़ा सामाजिक समूह बताया गया है। यही वजह है कि कांग्रेस, भाजपा और बसपा जैसी पार्टियों की राजनीति में जाटव और व्यापक दलित मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।
लेकिन सितंबर 2026 के हिंडौन नगर परिषद चुनाव ने एक अलग तस्वीर सामने रखी है। चुनाव परिणाम बताते हैं कि मतदाताओं का समर्थन केवल पार्टी के आधार पर एक जगह केंद्रित नहीं रहा। 60 वार्डों में 39 परe निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे, जबकि भाजपा को 12 और कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं। यानी नगर परिषद में निर्दलीयों ने दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों से कहीं अधिक सीटें हासिल कर स्थानीय राजनीति का समीकरण बदल दिया।
जाटव वोट बैंक भी पूरी तरह एकजुट नहीं दिखा
हिंडौन में जाटव समुदाय की राजनीतिक अहमियत को देखते हुए आरक्षित सीट पर प्रमुख दलों की रणनीति में इस समुदाय की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण रहती है। विधानसभा चुनावों में भी जाटव समाज से जुड़े उम्मीदवारों के बीच सीधा राजनीतिक मुकाबला देखने को मिलता रहा है। 2023 में हिंडौन विधानसभा सीट पर कांग्रेस की अनिता जाटव ने भाजपा की राजकुमारी जाटव को हराया था।
नगर परिषद चुनाव ने हालांकि यह संकेत दिया कि दलित मतदाताओं, विशेषकर जाटव मतदाताओं का समर्थन किसी एक राजनीतिक दल या प्रत्याशी के पक्ष में स्वतः स्थानांतरित नहीं माना जा सकता। स्थानीय प्रत्याशी की व्यक्तिगत पहचान, वार्ड स्तर का संपर्क, स्थानीय समीकरण और विकास से जुड़े मुद्दे भी मतदान को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी का एक उदाहरण नगर परिषद के वार्ड 22 में भी देखने को मिला, जहां चिंटू जाटव कांग्रेस के टिकट पर विजयी हुए। यह वार्ड अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था।
39 निर्दलीयों की जीत ने दिया बड़ा राजनीतिक संदेश
हिंडौन नगर परिषद चुनाव में निर्दलीयों की 39 सीटों की जीत सबसे बड़ा राजनीतिक संकेत बनकर सामने आई है। 60 सदस्यीय परिषद में बहुमत का आंकड़ा 31 है, जबकि भाजपा 12 और कांग्रेस 9 सीटों तक सीमित रही।
इस परिणाम को केवल भाजपा-कांग्रेस के बीच मुकाबले के तौर पर देखना अधूरा होगा। परिणामों ने यह भी दिखाया कि स्थानीय निकाय चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और वार्ड स्तर का समीकरण कई जगह पार्टी पहचान पर भारी पड़ सकता है।
यही कारण है कि चुनाव के बाद हिंडौन की राजनीति में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई।
निर्दलीय सबसे ज्यादा जीते, फिर भी भाजपा ने बनाया बोर्ड
चुनाव परिणामों में एक दिलचस्प राजनीतिक स्थिति सामने आई। सबसे ज्यादा 39 सीटें निर्दलीयों के खाते में जाने के बावजूद सभापति पद भाजपा के खाते में गया। भाजपा की विजय कुमारी सभापति पद पर निर्विरोध निर्वाचित हुईं, क्योंकि निर्दलीय प्रत्याशी फुलवा देवी ने अपना नामांकन वापस ले लिया और विजय कुमारी एकमात्र प्रत्याशी रह गईं।
इस तरह पार्षदों की संख्या में भाजपा निर्दलीयों से काफी पीछे रहने के बावजूद सभापति पद हासिल करने में सफल रही। यह घटनाक्रम बताता है कि नगर परिषद की राजनीति में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका निर्णायक हो गई है और बोर्ड के कामकाज में उनके समर्थन का महत्व रहेगा।
कांग्रेस के लिए संगठन और अंदरूनी समीकरण चुनौती
चुनाव के दौरान कांग्रेस के भीतर टिकट और स्थानीय संगठन को लेकर मतभेदों की चर्चा राजनीतिक रूप से काफी प्रमुख रही। इसके विपरीत भाजपा ने अपने संगठन और पार्षदों के बीच बेहतर समन्वय के जरिए सभापति पद तक पहुंच बनाई।
हालांकि इन राजनीतिक घटनाक्रमों को केवल दलों की जीत-हार के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। 39 निर्दलीयों का चुना जाना यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या हिंडौन के मतदाता स्थानीय प्रतिनिधि को पार्टी से अधिक महत्व देने लगे हैं?
इसका अंतिम जवाब आगामी विधानसभा और अन्य चुनावों में ही स्पष्ट होगा।
अब असली परीक्षा विकास के मुद्दों पर
नगर परिषद चुनाव में उम्मीदवारों ने विकास के अलग-अलग दावे और वादे किए। लेकिन चुनाव के बाद शहर के सामने वही बुनियादी सवाल खड़े हैं—सड़क, बिजली, पानी, सफाई, जल निकासी और शहरी सुविधाएं।
अब जनता की नजर इस बात पर होगी कि 60 पार्षदों वाला नया नगर परिषद बोर्ड इन समस्याओं को किस तरह उठाता है और उनका समाधान किस स्तर तक करा पाता है।
हिंडौन के राजनीतिक समीकरण का नया सवाल
हिंडौन की राजनीति में जाटव समुदाय की अहम भूमिका आने वाले समय में भी बनी रहने की संभावना है। लेकिन 2026 के नगर परिषद चुनाव ने एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर दिया है—दलित और जाटव मतों को एकमुश्त किसी एक राजनीतिक दल के साथ जोड़कर देखना अब आसान नहीं है।
39 निर्दलीय पार्षदों की जीत, भाजपा के 12 और कांग्रेस के 9 पार्षदों के परिणाम ने स्थानीय राजनीति को पहले की तुलना में अधिक बहुकोणीय बना दिया है। अब देखना यह होगा कि यह बिखरा हुआ जनादेश आने वाले समय में किस तरह के राजनीतिक गठजोड़ और स्थानीय नेतृत्व को जन्म देता है।

