Monday, September 28, 2026
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संतों की वाणी ने दिया सामाजिक समरसता का संदेश : डॉ. रणधीर सिंह

संत काव्य परंपरा ने साहित्य को मानवीय सरोकारों से जोड़ा : प्रो. महासिंह पूनिया

मूकनायक/सरिता रानी
कुरुक्षेत्र/पानीपत/हरियाणा

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में हिंदी विभाग की ओर से मंगलवार को ‘संत काव्य परंपरा’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता दयाल सिंह कॉलेज, करनाल के प्रोफेसर रणधीर सिंह रहे।
प्रो. रणधीर सिंह ने कहा कि संतों की वाणी ने सामाजिक समरसता, मानवीय समानता और आपसी सद्भाव का सशक्त संदेश दिया। संत कवियों ने जाति, वर्ग, ऊंच-नीच तथा धार्मिक संकीर्णताओं से ऊपर उठकर मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की दृष्टि विकसित की। कबीर, रैदास और गुरु नानक आदि संतों की वाणी में सामाजिक कुरीतियों के विरोध के साथ प्रेम, करुणा, सह-अस्तित्व और भाईचारे की भावना प्रमुखता से दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि संतों की वाणी और वर्तमान कविता में मूलभूत अंतर है। संतों की वाणी बिना किसी बाह्य प्रयास के उनके अपने जीवन-अनुभवों से उपजी थी। उन्होंने कहा कि संतों की वाणी इस्लाम की कट्टरपंथी धारणाओं तथा हिंदू धर्म की कुरीतियों के विरुद्ध मुखर हुई और दोनों धार्मिक परंपराओं की कुरीतियों पर समान रूप से प्रहार किया। वर्तमान समय की आपाधापी में संतों की वाणी जीवन के लिए सम्यक मार्गदर्शक का काम कर सकती है।
हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. महासिंह पूनिया ने कहा कि संत काव्य परंपरा हिंदी साहित्य की ऐसी धारा है, जिसने साहित्य को आम लोगों के जीवन से जोड़ा। संत कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में समानता, प्रेम, भाईचारे और सद्भाव की भावना को मजबूत किया। उन्होंने विद्यार्थियों से संत साहित्य का गंभीर अध्ययन करने और उसके मानवीय संदेश को समझने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार के व्याख्यानों का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य की समृद्ध संत काव्य परंपरा के विविध और अनछुए पक्षों से गहराई से परिचित कराना है।
व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने संत काव्य की भाषा, भक्ति आंदोलन, निर्गुण-सगुण परंपरा तथा संत साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता से जुड़े प्रश्न पूछे। इस दौरान साहित्य में मानवीय मूल्यों, कबीर और रैदास जैसे संतों की वैचारिक क्रांति तथा आधुनिक परिदृश्य में संत परंपरा की प्रासंगिकता पर गहन विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम में डॉ. जसबीर सिंह, एम.ए. हिंदी के विद्यार्थी तथा विभाग के सभी शोधार्थी उपस्थित रहे।

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