मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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सृष्टि का यह शाश्वत नियम है कि जो गतिशील है, वही जीवंत है। बहती नदी का जल हमेशा निर्मल, स्वच्छ और पीने योग्य रहता है क्योंकि वह लगातार आगे बढ़ती रहती है। इसके विपरीत, जब नदी का पानी एक जगह रुक जाता है, तो वह ठहरा हुआ जल धीरे-धीरे सड़न और दलदल का रूप ले लेता है। ठीक यही नियम मानव जीवन पर भी लागू होता है। मनुष्य का रुक जाना, यानी कर्महीन हो जाना, उसके पतन की शुरुआत है, जबकि निरंतर चलते रहना ही विकास और सफलता का मार्ग है। मानव जीवन में रुकने का अर्थ है कि नया सीखने की चाह छोड़ देना, चुनौतियों से डरकर प्रयास बंद कर देना और आलस्य को अपना लेना।
जब कोई व्यक्ति जीवन में आगे बढ़ना बंद कर देता है, तो उसकी बुद्धि, कौशल और रचनात्मकता में जंग लग जाता है। ठहराव व्यक्ति को मानसिक और सामाजिक रूप से कमजोर बना देता है । दूसरी ओर, निरंतर कर्मशील रहने वाला व्यक्ति हर परिस्थिति में मार्ग खोज लेता है। इतिहास गवाह है कि जिसने भी समय के साथ चलना और बदलाव को स्वीकार करना सीखा, सफलता ने उसी के कदम चूमे। प्रगतिशील सोच और निरंतर प्रयास ही मनुष्य को समाज में मान-सम्मान और उन्नति दिलाते हैं। जीवन में चाहे जितनी भी बाधाएं आएं, हमें नदी की तरह अपना रास्ता बनाते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। संक्षेप में कहें तो चलते रहने का नाम ही जिंदगी है और रुकना पतन का कारण है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

