मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी डॉ ओमप्रकाश वर्मा
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डॉ. भीमराव अंबेडकर का यह कथन हमारे समाज और शासन प्रणाली के एक कड़वे सच को उजागर करता है। वे कहते हैं कि यह एक बड़ी विडंबना है कि हमारा संविधान हमारे हक और अधिकारों के पक्ष में है, लेकिन समाज की व्यवस्था उसके विरोध में खड़ी दिखती है। इसके बावजूद, हम आंखें मूंदकर उसी व्यवस्था के गुणगान में व्यस्त रहते हैं। यह विचार आज के समय में भी बेहद प्रासंगिक है । संविधान ने हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार दिया है। कानून की नजर में सभी बराबर हैं। लेकिन जब हम धरातल पर सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था को देखते हैं, तो वहां आज भी जातिवाद, असमानता और भेदभाव का बोलबाला मिलता है।
कई बार आम इंसान को अपने बुनियादी अधिकारों को पाने के लिए भी इस जटिल व्यवस्था से लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। डॉ. अंबेडकर हमें सचेत करते हैं कि हमें व्यवस्था का अंधभक्त नहीं बनना चाहिए। यदि कोई व्यवस्था नागरिकों के अधिकारों का हनन करती है या संविधान की मूल भावना के खिलाफ काम करती है, तो उस पर सवाल उठाना हर नागरिक का कर्तव्य है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब जनता जागरूक हो और गलत व्यवस्था को सुधारने का साहस रखती हो। हमें केवल संविधान के होने पर खुश नहीं होना है, बल्कि उसे पूरी तरह लागू करवाने के लिए जागरूक समाज का निर्माण करना होगा।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

