CG: कोरबा में 11 साल के बच्चे ने भालू से भिड़कर बचाई 7 साल के मासूम भाई की जान…. हालत गंभीर, हमले के बाद सैलानी बच्चों को जंगल में छोड़ भागे
मूकनायक
श्री एम. ए. सिद्दीकी जी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़
कोरबा 21 सितंबर 2026। कोरबा जिले के लेमरू वन क्षेत्र में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। बताया जा रहा है कि सैलानियों को पहाड़ की गुफा में शैलचित्र दिखाने जा रहे पहाड़ी कोरवा बच्चों का सामना भालू से हो गया। भालू को देखते ही दोनों बच्चों को जंगल में छोड़कर सैलानी भाग निकले। सात साल के छोटे भाई पर भालू को हमला करते देख 11 वर्षीय पहाड़ी कोरवा बालक ने अपनी जान की परवाह किए बिना भालू से भिड़ गया। उसने पत्थर उठाकर भालू पर लगातार हमला किया और आखिरकार उसे जंगल की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। हालांकि हमले में सोनू का छोटा भाई मुकेश गंभीर रूप से घायल हो गया। उसके चेहरे और सिर पर भालू ने गहरे जख्म किए हैं। प्राथमिक उपचार के बाद उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे रायपुर रेफर किया गया है। वहीं परिजनों ने सैलानियों पर गांव पहुंचकर बच्चों को लालच देकर अपने साथ ले जाकर जान जोखिम में डालने का गंभीर आरोप लगाया है।
जानकारी के मुताबिक ये पूरा घटनाक्रम कोरबा वनमंडल के लेमरू वन परिक्षेत्र के ग्राम छातीबहार की है। यहां पहाड़ी कोरवा परिवार रहते हैं। करम सिंह पहाड़ी कोरवा खेती-किसानी और वनोपज संग्रहण से परिवार का पालन-पोषण करते हैं। बताया जा रहा है कि रविवार सुबह कार सवार तीन युवक गांव पहुंचे। उन्होंने ग्रामीणों को बताया कि वे गांव के समीप गुफा में बने शैलचित्र देखना चाहते हैं। इसके बाद वे करम सिंह के दोनों बेटों सोनू (11) और मुकेश (7) को अपने साथ लेकर गुफा की ओर जाने लगे। परिजनों का आरोप है कि सैलानियों ने बच्चों को कपड़े भी दिए और उन्हें साथ चलने के लिए तैयार किया। बच्चे रास्ता जानते थे, इसलिए दोनों भाई उन्हें गुफा की ओर ले जा रहे थे। गुफा की ओर जाते समय अचानक झाड़ियों से एक भालू निकल आया। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, भालू ने सात वर्षीय मुकेश पर हमला कर दिया। भालू को देखते ही सैलानी वहां से भाग निकले और दोनों बच्चों को जंगल में छोड़ गए।
छोटे भाई को भालू के पंजों में फंसा देखकर 11 वर्षीय सोनू पीछे नहीं हटा। उसने शोर मचाया और भालू को भगाने के लिए पत्थर उठाकर उस पर हमला करना शुरू कर दिया। भालू के हमले में सोनू को भी चोटें आईं, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी। वह लगातार शोर करता रहा और पत्थर मारकर भालू का सामना करता रहा। आखिरकार भालू मुकेश को छोड़कर जंगल की ओर भाग गया। इस दौरान मुकेश के चेहरे और सिर पर गंभीर चोटें आईं और वह खून से लथपथ हो गया। सोनू किसी तरह अपने छोटे भाई को लेकर घर पहुंचा और परिवार को पूरी घटना बताई। घटना की सूचना मिलने के बाद रायपुर कंट्रोल रूम से इवेंट मिलने पर संजीवनी एक्सप्रेस की टीम मौके पर पहुंची। ईएमटी पुष्पा वैष्णव और पायलट अरुण कुमार ने दोनों बच्चों को मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचाया। दोनों का उपचार किया गया। प्राथमिक उपचार के बाद सात वर्षीय मुकेश की हालत गंभीर होने पर उसे बेहतर इलाज के लिए रायपुर रेफर किया गया है। सोनू का भी उपचार कराया गया है।
11 साल के भाई की बहादुरी बनी सबसे बड़ी उम्मीद
भालू के सामने आमना-सामना होने के बावजूद 11 वर्षीय सोनू ने जिस तरह अपने छोटे भाई को बचाने के लिए जान जोखिम में डाली, वह इस घटना का सबसे अहम पहलू है। जिस उम्र में बच्चे खुद बड़ों की मदद के मोहताज होते हैं, उसी उम्र में सोनू ने भालू का सामना कर अपने सात वर्षीय भाई को बचाने की कोशिश की। हालांकि इस घटना ने वन क्षेत्र में बच्चों को ले जाने और पर्यटकों की सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारी को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेष रूप से यह सवाल अहम है कि क्या सैलानियों ने बच्चों को वन क्षेत्र में ले जाने से पहले संभावित खतरे को समझा था और खतरा सामने आने पर बच्चों को अकेला छोड़कर भागना क्यों चुना ?
सैलानियों की भूमिका पर गंभीर सवाल
इस घटना में सबसे बड़ा सवाल उन तीन सैलानियों की भूमिका को लेकर उठ रहा है, जो बच्चों को अपने साथ गुफा तक ले गए थे। यदि वे बच्चों को अपने साथ ले गए थे तो भालू के हमले के समय उन्हें अकेला छोड़कर भागना गंभीर लापरवाही का मामला माना जा सकता है। परिजनों का कहना है कि यदि सैलानी मौके पर रुककर बच्चों की मदद करते तो मुकेश को इतनी गंभीर चोटों से बचाया जा सकता था। घटना के बाद से परिवार में आक्रोश है और बच्चों को वन क्षेत्र में ले जाने वाले लोगों की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। घटना की जानकारी मिलने पर ग्रामीणों ने लेमरू वन परिक्षेत्राधिकारी देवव्रत सिन्हा को सूचना दी। रेंजर ने तत्काल वन अमले को मौके के लिए रवाना किया। वन कर्मियों की टीम अस्पताल पहुंची और पीड़ित परिवार को विभागीय प्रावधान के तहत तत्कालिक सहायता राशि उपलब्ध कराई। रेंजर देवव्रत सिन्हा ने घायल बालक को बेहतर चिकित्सा सुविधा दिलाने के लिए भी प्रयास किया।


