मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मानव जीवन संघर्षों और चुनौतियों से भरा हुआ है। जीवन की इस अंतहीन यात्रा में कई बार ऐसा मोड़ आता है, जब इंसान पूरी तरह टूट जाता है। असफलता के घने बादल उम्मीद की हर किरण को ढक लेते हैं, पैर लड़खड़ाने लगते हैं और मन हताशा से भर जाता है। ऐसे निराशाजनक क्षणों में जब दुनिया का हर मोटिवेशन बेअसर लगने लगे, तब अपने माता-पिता के त्याग और उनके संघर्ष को याद कर लेना चाहिए। उनका यही संघर्ष हमारी ढलती हुई हिम्मत को फिर से फौलाद बना देता है । माता-पिता ने हमें पालने और हमारे सपनों को पूरा करने के लिए ना जाने कितनी रातों की नींद और अपनी खुशियों का त्याग किया होता है. उनकी यही मेहनत हमारे अंदर फिर से हिम्मत जगा देती है ।
माता-पिता का पूरा जीवन एक मूक तपस्या की तरह होता है। वे अपनी सुख-सुविधाओं, इच्छाओं और सपनों की आहुति सिर्फ इसलिए दे देते हैं ताकि हमारी जिंदगी संवर सके। हमारे पैरों को मजबूती देने के लिए ना जाने वे कितनी बार खुद लड़खड़ाए होंगे। कड़कड़ाती धूप में पसीना बहाना हो या समाज के तानों को सहना, उन्होंने हर मुश्किल को हंसते हुए सिर्फ हमारे बेहतर भविष्य के लिए झेला है।जब हम उनके इस निस्वार्थ संघर्ष और उम्मीदों से भरी आंखों को याद करते हैं तो हमारे अंदर एक नई ऊर्जा का संचार होता है। हमें अहसास होता है कि हमारी हार सिर्फ हमारी हार नहीं होगी, बल्कि उनके सालों के बलिदान की भी हार होगी। माता-पिता का यह संघर्ष हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों ना हों, घुटने नहीं टेकने चाहिए। उनका त्याग हमारे भीतर एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करता है, जो हमें हर असफलता से लड़ने की यकीनन फिर से हिम्मत देता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

