Monday, September 28, 2026
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पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर : सामाजिक समानता और आत्मसम्मान के प्रखर योद्धा

पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर (17 सितंबर 1879 – 24 दिसंबर 1973) दक्षिण भारत के प्रमुख समाज सुधारक, तर्कवादी, नास्तिक चिंतक और सामाजिक न्याय के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, सामाजिक भेदभाव, अंधविश्वास और महिलाओं की असमान स्थिति के विरुद्ध व्यापक आंदोलन चलाया। तमिलनाडु में सामाजिक और राजनीतिक चेतना के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
आधुनिक भारत में सामाजिक समानता और बहुजन चिंतन की परंपरा में ज्योतिराव फुले, डॉ. भीमराव आंबेडकर और पेरियार ई.वी. रामास्वामी के विचारों का विशेष स्थान है।

प्रारंभिक जीवन

पेरियार का जन्म 17 सितंबर 1879 को तमिलनाडु के ईरोड में एक संपन्न व्यापारी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम वेंकटप्पा नायकर और माता का नाम चिन्नाबाई था। उनकी औपचारिक शिक्षा सीमित रही और कम उम्र में ही उन्होंने विद्यालय छोड़कर पारिवारिक व्यापार में सहयोग करना शुरू कर दिया।
उनका विवाह नागम्मई से हुआ। धार्मिक और रूढ़िवादी वातावरण में पले-बढ़े होने के बावजूद पेरियार किशोरावस्था से ही परंपराओं को तर्क की कसौटी पर कसने लगे थे। वे धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक रूढ़ियों के बारे में सवाल उठाते थे तथा जातिगत भेदभाव को स्वीकार नहीं करते थे।
उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में भी सामाजिक समानता के सिद्धांतों को अपनाया। वे तथाकथित अस्पृश्य माने जाने वाले लोगों को अपने घर बुलाते और उनके साथ भोजन करते थे। महिलाओं को सामाजिक बंधनों से मुक्त करने और उन्हें सम्मानजनक एवं समान अधिकार दिलाने की भी उन्होंने वकालत की।
कांग्रेस से जुड़ाव और सामाजिक संघर्ष
पेरियार प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े। स्वतंत्रता आंदोलन और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्होंने अपने व्यापार और विभिन्न संस्थाओं से जुड़े दायित्वों को छोड़कर आंदोलन के लिए स्वयं को समर्पित किया।
असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने नशाबंदी और अदालतों के बहिष्कार जैसे कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने अपने निजी आर्थिक हितों की परवाह किए बिना आंदोलन का समर्थन किया।
वाइकोम आंदोलन

पेरियार के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय वाइकोम आंदोलन था। केरल के वाइकोम में जातिगत भेदभाव के कारण कुछ समुदायों को मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर आने-जाने से रोका जाता था। पेरियार ने इस भेदभाव के विरोध में आंदोलन का नेतृत्व किया और गिरफ्तार भी हुए।
वाइकोम आंदोलन के कारण उन्हें व्यापक पहचान मिली। इसी संघर्ष के चलते उन्हें ‘वाइकोम वीरर’ के नाम से भी सम्मानित किया गया।
कांग्रेस से अलगाव और आत्मसम्मान आंदोलन
जाति और सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर कांग्रेस नेतृत्व से उनके मतभेद बढ़ते गए। अंततः 1925 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी।
इसी वर्ष उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement) की शुरुआत की। इस आंदोलन का उद्देश्य जातिगत ऊंच-नीच, अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध करते हुए लोगों में आत्मसम्मान, तर्कशीलता और समानता की भावना विकसित करना था।
पेरियार का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज के भीतर मौजूद जातिगत और सामाजिक असमानताओं को भी समाप्त किया जाए।
जाति व्यवस्था और सामाजिक समानता
पेरियार ने जाति व्यवस्था की तीखी आलोचना की। उनका मानना था कि जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को ऊंचा या नीचा मानना मानव समानता के विरुद्ध है।
उन्होंने विशेष रूप से गैर-ब्राह्मण समुदायों, दलितों और पिछड़े वर्गों के सामाजिक तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग उठाई। वे शिक्षा और सरकारी सेवाओं में सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की भागीदारी बढ़ाने के पक्षधर थे।
उनके आंदोलन ने दक्षिण भारत में सामाजिक न्याय, आरक्षण और प्रतिनिधित्व की बहस को व्यापक रूप से प्रभावित किया।
तर्कवाद और अंधविश्वास का विरोध

पेरियार के विचारों का एक प्रमुख आधार तर्कवाद था। वे किसी भी धार्मिक या सामाजिक मान्यता को केवल परंपरा के आधार पर स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे।
उन्होंने अंधविश्वास, कर्मकांड और ऐसी धार्मिक मान्यताओं का विरोध किया जिन्हें वे सामाजिक असमानता को बनाए रखने वाला मानते थे। वे लोगों से प्रश्न पूछने, तर्क करने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान करते थे।
ईश्वर और धर्म के संबंध में उनके विचार अत्यंत कठोर और विवादास्पद रहे। उनका मूल तर्क यह था कि ऐसी मान्यताओं को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए जो मनुष्यों के बीच ऊंच-नीच और भेदभाव को उचित ठहराती हों।
महिलाओं के अधिकारों के समर्थक
पेरियार ने महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता के प्रश्न को भी अपने सामाजिक आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया। वे बाल विवाह, दहेज, पितृसत्तात्मक नियंत्रण और महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध जैसी सामाजिक प्रथाओं के विरोधी थे।
उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, संपत्ति के अधिकार, विवाह में स्वतंत्रता और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। आत्मसम्मान आंदोलन में ऐसे विवाहों को बढ़ावा दिया गया जिनमें अनावश्यक धार्मिक कर्मकांड के बजाय समानता और सहमति को महत्व दिया जाता था।
हिंदी-विरोधी आंदोलन और द्रविड़ आंदोलन

तमिलनाडु की राजनीति और समाज पर पेरियार का प्रभाव भाषा के प्रश्न से भी जुड़ा रहा। उन्होंने हिंदी को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने के प्रयासों का विरोध किया और तमिल भाषा तथा द्रविड़ पहचान के अधिकारों की वकालत की।
1944 में जस्टिस पार्टी और आत्मसम्मान आंदोलन की राजनीतिक धारा को मिलाकर द्रविड़ कषगम (Dravidar Kazhagam) का गठन किया गया। आगे चलकर द्रविड़ आंदोलन से कई राजनीतिक धाराएं विकसित हुईं, जिनका तमिलनाडु की राजनीति पर लंबे समय तक प्रभाव रहा।
सामाजिक न्याय और राजनीतिक प्रतिनिधित्व

पेरियार का मानना था कि सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को शासन, शिक्षा और नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। वे जनसंख्या और सामाजिक स्थिति के अनुरूप प्रतिनिधित्व की मांग करते थे।
1950 में मद्रास राज्य में सामुदायिक आधार पर आरक्षण से संबंधित सरकारी आदेश को न्यायालय में चुनौती दी गई। स्टेट ऑफ मद्रास बनाम चम्पकम दोरैराजन मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद आरक्षण व्यवस्था को लेकर बड़ा संवैधानिक विवाद उत्पन्न हुआ।
इस घटनाक्रम के बाद संविधान में प्रथम संशोधन किया गया, जिसके माध्यम से अनुच्छेद 15 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान का संवैधानिक आधार मजबूत हुआ। यह घटनाक्रम भारत में आरक्षण और सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण माना जाता है।
विदेश यात्राएं और वैचारिक प्रभाव

1930 के दशक में पेरियार ने रूस सहित कई यूरोपीय देशों की यात्रा की। उन्होंने वहां की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। इन यात्राओं ने उनके विचारों को प्रभावित किया और सामाजिक तथा आर्थिक समानता के प्रश्नों पर उनकी समझ को व्यापक बनाया।

पेरियार की विचारधारा

पेरियार के चिंतन के प्रमुख आधार थे—

जाति व्यवस्था का विरोध
सामाजिक समानता
आत्मसम्मान और मानव गरिमा
तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
अंधविश्वास एवं रूढ़ियों का विरोध
महिलाओं की समानता और स्वतंत्रता
वंचित समुदायों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व
शिक्षा और अवसरों में समानता
सामाजिक सुधार को राजनीतिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण आधार मानना

उनका मानना था कि केवल सत्ता परिवर्तन से समाज में वास्तविक मुक्ति नहीं आएगी। सामाजिक भेदभाव और जातिगत असमानता को समाप्त करना भी आवश्यक है।

निधन और विरासत

पेरियार ई.वी. रामास्वामी का निधन 24 दिसंबर 1973 को हुआ। उनके अनुयायियों ने उन्हें ‘पेरियार’ अर्थात ‘महान व्यक्ति’ और ‘थंथाई’ अर्थात ‘पिता’ की उपाधियों से सम्मानित किया।
उनकी विचारधारा ने तमिलनाडु में सामाजिक न्याय और द्रविड़ आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया। जाति-विरोध, तर्कवाद, महिलाओं की समानता और सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े उनके विचार आज भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हैं।
पेरियार का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक परिवर्तन केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने से नहीं, बल्कि समाज की रूढ़ियों, असमानताओं और भेदभावपूर्ण मान्यताओं को चुनौती देने से भी जुड़ा होता है। उन्होंने अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में समानता, आत्मसम्मान और तर्कशीलता को सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख आधार के रूप में प्रस्तुत किया।

नीरज भुक्कल
प्राध्यापक हिन्दी
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय तहसील कैम्प पानीपत
M.9728350305

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