मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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वाणी’ मनुष्य को मिला एक अनूठा और सबसे अमूल्य उपहार है। यह हमारे विचारों और अंतर्मन का दर्पण होती है, लेकिन यदि इस पर नियंत्रण ना हो, तो यह विनाश का कारण भी बन सकती है। इसी संदर्भ में कहा गया है कि तीखे शब्द दूसरों का घर जलाते हैं। कटु और कड़वे वचन केवल कानों को नहीं चुभते, बल्कि वे सीधे हृदय पर आघात करते हैं। कड़वी वाणी से बरसों पुराने रिश्ते पल भर में राख हो जाते हैं, क्योंकि शारीरिक घाव तो समय के साथ भर जाते हैं, परंतु शब्दों के घाव जीवनभर याद रहते हैं। इसके विपरीत, कम बोलना और तौलकर बोलना शालीनता तथा उच्च व्यक्तित्व का प्रतीक है। सोच-समझकर बोलने वाला व्यक्ति कभी भी विवादों में नहीं फंसता।
हमारी भारतीय संस्कृति में ‘मौन’ और ‘मितभाषी’ (कम बोलने वाले) होने को एक महान गुण माना गया है। संत कबीरदास जी ने भी कहा है कि “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय । औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय।” जब हम अपने शब्दों को विवेक के तराजू में तौलकर बोलते हैं तो हमारी बात का महत्व और सम्मान दोनों बढ़ जाते हैं। अनावश्यक बोलने से ऊर्जा और समय नष्ट होता है, जबकि गंभीर और नपे-तुले शब्द समाज में हमारी प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं। शालीनता का अर्थ केवल सुंदर कपड़े पहनना नहीं, बल्कि अपनी जुबान पर संयम रखना भी है। संक्षेप में कहें तो, हमारी वाणी में वह शक्ति होनी चाहिए जो किसी का घर उजाड़े नहीं, बल्कि बिखरते हुए दिलों को आपस में जोड़ दे।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

