मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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इतिहास गवाह है कि जब-जब जनता की आवाज़ को लंबे समय तक सत्ता, तानाशाही या दमनकारी व्यवस्था द्वारा दबाया जाता है, तो वह खामोशी किसी शांति का प्रतीक नहीं होती। वह एक गहरे, सुलगते हुए असंतोष का संकेत होती है। दबाव और अन्याय के साए में पनप रही यह खामोशी अंततः एक बड़े और हिंसक विद्रोह का रूप ले लेती है। मानव स्वभाव स्वभावतः स्वतंत्रता और न्याय की आकांक्षा रखता है। जब अभिव्यक्ति के सारे मार्ग बंद कर दिए जाते हैं और मूलभूत अधिकारों का हनन होता है, तो जनता के भीतर का धैर्य धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। मरता क्या न करता” की यह स्थिति समाज को हिंसा की ओर धकेलती है। यह विद्रोह केवल सत्ता के खिलाफ नहीं होता, बल्कि उन तमाम व्यवस्थाओं के खिलाफ होता है, जो शोषण का जरिया बनी हुई हैं।
फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, श्रीलंका, नेपाल या दुनिया भर के अन्य स्वतंत्रता संग्राम इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जहाँ शासकों ने जनभावनाओं को कुचलने का प्रयास किया, लेकिन परिणाम स्वरूप उन्हें एक ऐसी हिंसक क्रांति का सामना करना पड़ा, जिसने पूरे साम्राज्य को उखाड़ फेंका। यह बदलाव अचानक नहीं होता। यह घड़े में बूंद-बूंद पानी भरने जैसा है, जो एक दिन लबालब होकर बहने लगता है। जब तक संवाद की गुंजाइश रहती है, तब तक शांतिपूर्ण समाधान संभव होता है, परंतु जब संवाद के सारे दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं, तो वह ‘मौन’ एक हिंसक ज्वालामुखी में बदल जाता है। अतः, किसी भी समाज या राष्ट्र की स्थिरता के लिए यह आवश्यक है कि जनसामान्य की आवाज़ को सुना जाए क्योंकि दबी हुई आवाज़ें जब मुखर होती हैं तो वे अपने साथ इतिहास बदलने का सामर्थ्य लेकर आती हैं।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

