Monday, September 28, 2026
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इंसान की जिंदगी में कुछ तकलीफें ऐसी आती हैं, जो बाहर से कोई घाव नहीं दिखातीं, परंतु अंदर से इंसान को पूरी तरह कर देती हैं खोखला

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जिंदगी का मतलब सिर्फ सांसें लेना या दिल का धड़कना नहीं है, बल्कि उत्साह, उम्मीद और किसी मकसद के साथ हर दिन को जीना है, लेकिन इंसान की जिंदगी में कुछ तकलीफें ऐसी आती हैं, जो बाहर से कोई घाव नहीं दिखातीं, परंतु अंदर से इंसान को पूरी तरह खोखला कर देती हैं। ऐसी स्थिति में इंसान तकनीकी रूप से जिंदा तो रहता है, समाज की नजरों में हंसता-बोलता भी है, मगर वह भीतर से हर पल दम तोड़ रहा होता है। उसके पास जीने की वजह यानी ‘जीने का उत्साह’ नहीं बचता। ये तकलीफें किसी भी रूप में हो सकती हैं—जैसे किसी बेहद करीबी इंसान को हमेशा के लिए खो देना, भरोसे का टूट जाना, लगातार मिलने वाली असफलताएं, या फिर कोई ऐसा मानसिक अकेलापन जिसे किसी के साथ साझा ना किया जा सके। ऐसी चोटें इंसान के आत्मसम्मान और इच्छाशक्ति पर सीधा प्रहार करती हैं।
व्यक्ति सुबह उठता है, दिनभर के काम करता है और रात को सो जाता है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में उसकी आत्मा गायब होती है। वह केवल एक चलती-फिरती लाश बनकर रह जाता है, जो सिर्फ वक्त काट रही है। जब जिंदगी से उम्मीद और प्रेम का रंग उड़ जाता है, तब वजूद सिर्फ एक बोझ लगने लगता है। हालांकि, यह स्थिति जितनी दर्दनाक है, उतनी ही यह इंसान को एक नई गहराई भी देती है। जो लोग इस खामोश जंग को लड़कर बाहर निकलते हैं, वे जीवन के वास्तविक अर्थ को समझ पाते हैं। ऐसी तकलीफों से उबरने के लिए धैर्य, अपनों के साथ और सबसे बढ़कर खुद को स्वीकार करने की जरूरत होती है। जिंदगी दोबारा मुस्कुरा सकती है, बस उस धुंध के छंटने का इंतजार करना होता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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