वर्षों से सत्ता और योजनाओं के बावजूद आदिवासी अंचल में व्यापक स्वास्थ्य इंतजाम क्यों नहीं? — कम्युनिस्ट पार्टी जिलाध्यक्ष ने मांगी जवाबदेही
मूकनायक समाचार -/ सत्यशील गोंडाने -/ बालाघाट (मध्यप्रदेश)
बालाघाट। जिले के आदिवासी अंचल में मासूम बच्चों की लगातार मौत का मामला अब केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था और जवाबदेही पर गंभीर सवाल बनता जा रहा है। बैहर-बिरसा क्षेत्र में आदिवासी बच्चों की मौतों को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में संख्या अलग-अलग सामने आई है। हाईकोर्ट ने भी मामले में राज्य सरकार से जवाब मांगा है।
इसी गंभीर घटनाक्रम को लेकर कम्युनिस्ट पार्टी के जिलाध्यक्ष का दर्द सामने आया। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि जब सरकार के पास वर्षों से आदिवासी क्षेत्रों के विकास, स्वास्थ्य, पोषण, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं के लिए योजनाएं संचालित हैं, तो फिर जमीनी स्तर पर ऐसी स्थिति क्यों बनी हुई है कि नौनिहालों की जान जा रही है?
मौतों के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम?
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच, समय पर उपचार, पोषण, स्वच्छ पेयजल और आवागमन जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। हालिया रिपोर्टों में भी प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य, पानी, सड़क और राशन जैसी व्यवस्थाओं की समस्याओं का उल्लेख सामने आया है।
कम्युनिस्ट पार्टी जिलाध्यक्ष ने कहा कि बच्चों की मौत के बाद केवल अधिकारियों के दौरे, बैठकों और निर्देशों से समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि प्रभावित गांवों में स्थायी स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी की जाए और यह तय किया जाए कि बीमारी फैलने से पहले उसकी रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए गए थे।
सरकार जिम्मेदारी से पल्ला न झाड़े
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन मौतों की जिम्मेदारी किसकी है? यदि आदिवासी परिवार लंबे समय से स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं की समस्याओं से जूझ रहे थे, तो संबंधित विभागों ने समय रहते क्या कार्रवाई की? ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, दवाइयों, जांच, पोषण और रेफरल व्यवस्था की नियमित निगरानी क्यों नहीं हुई?
सरकार की ओर से स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करने के लिए उपाय घोषित किए जाने की जानकारी सामने आई है, लेकिन अब चुनौती इन घोषणाओं को प्रभावित गांवों तक प्रभावी रूप से पहुंचाने की है।
सवाल सिर्फ मौतों का नहीं, जवाबदेही का भी
कम्युनिस्ट पार्टी जिलाध्यक्ष ने कहा कि आदिवासी बच्चों की मौत को महज बीमारी या मौसम की समस्या बताकर मामले को समाप्त नहीं किया जा सकता। हर मौत के कारण की निष्पक्ष जांच और प्रशासनिक जवाबदेही तय होना जरूरी है।
उन्होंने मांग उठाई कि प्रभावित गांवों में विशेष स्वास्थ्य शिविर, बच्चों की नियमित जांच, पोषण की निगरानी, सुरक्षित पेयजल, आवश्यक दवाइयों की उपलब्धता और आपातकालीन उपचार व्यवस्था को मजबूत किया जाए। साथ ही जिन स्तरों पर लापरवाही सामने आए, वहां जिम्मेदारी तय की जाए।
आदिवासी परिवारों को चाहिए जवाब, सिर्फ आश्वासन नहीं
बालाघाट के आदिवासी अंचल में बच्चों की मौत ने पूरे जिले सहित मध्यप्रदेश भारत देश को झकझोर दिया है। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन और सरकार इस संकट को स्थायी समाधान की दिशा में ले जाएगी या फिर मामला कुछ दिनों बाद फाइलों और बैठकों तक सीमित होकर रह जाए —जब योजनाएं वर्षों से हैं, बजट वर्षों से है और जिम्मेदार विभाग वर्षों से हैं, तो आदिवासी नौनिहालों की सुरक्षा के लिए जमीन पर पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं दिखे?
बच्चों की मौत पर राजनीति से आगे बढ़कर जवाबदेही, पारदर्शी जांच और स्थायी स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत है। यही प्रभावित आदिवासी परिवारों के प्रति वास्तविक संवेदनशीलता है !

