Tuesday, September 29, 2026
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मीडिया का नेरेटिव: जब नेताओं की साख और पहचान जाति से तय होती है — प्रशांत किशोर बनाम बहुजन नेतृत्व


मीडिया समाज में यह तय करने की शक्ति रखता है कि कौन “नेशनल लीडर” है और किसे स्थानीय या समुदाय-आधारित नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाए। हालिया राजनीतिक घटनाओं में इस नेरेटिव का स्वाभाविक और असमान उपयोग स्पष्ट रूप से दिखा है। जब किसी नेता का जमीनी प्रभाव, रणनीतिक कौशल या चुनावी सफलता उस नेता के सामाजिक पृष्ठभूमि से मेल नहीं खाती, तो मीडिया अक्सर उसे एक राष्ट्रीय व्यक्तित्व के रूप में स्थापित कर देता है। वहीं बहुजन नेताओं के साथ बिल्कुल उल्टा रवैया अपनाया जाता है — उन्हें संकुचित जातिगत पहचान में बांध दिया जाता है और उनकी व्यापक राजनीतिक संभावनाओं को अनदेखा किया जाता है।
प्रशांत किशोर का उदय और मीडिया की भूमिका
प्रशांत किशोर (PK) की राजनीति में सक्रियता और हाल में विधायक बनने की घटना ने मीडिया के उस पैटर्न को फिर सामने ला दिया है जिसमें किसी नेता के सफलता के बाद उसे राष्ट्रीय मंच पर विस्तृत कवरेज मिलती है — इंटरव्यू, पॉडकास्ट, पैनल चर्चा और विश्लेषणात्मक फीचर। PK के मामले में मीडिया उसे रणनीतिकार से आगे बढ़ाकर नेशनल-लेवल नेता के रूप में पोजिशन कर देगी: अधिक पेलम-पेल इंटरव्यू, पॉडकास्ट और ब्रॉडकास्टिंग अवसर मिलेंगे, और वह मजबूत ब्रांड इमेज बनाएंगे। यह कवरेज न सिर्फ उनके व्यक्तित्व को बढ़ावा देगा बल्कि राजनीतिक वैधता और नेटवर्किंग के अवसर भी खोल देगा।
बहुजन नेताओं के साथ दोगला मापदंड
वहीं दूसरी ओर, बहुजन नेताओं—विशेषकर दलित, पिछड़े या आदिवासी नेताओं—को अक्सर केवल उनकी जाति या समुदाय तक सीमित कर दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर चंद्रशेखर रावण व राजस्थान के राजकुमार रोत जैसे नेताओं के साथ मीडिया का व्यवहार बताता है कि:
उनकी राजनीतिक उपलब्धियों और नीति-आधारित विचारों की तुलना में जातिगत पहचान को प्राथमिकता दी जाती है।
उन्हें ‘कमजोर’ या ‘समुदाय-विशेष’ नेता के रूप में फ्रेम किया जाता है, जिससे राष्ट्रीय स्वीकार्यता के रास्ते बंद हो जाते हैं।
कई बार उनके बयान को डिफेम/संदर्भहीन विवादों के रूप में पेश कर दिया जाता है, बजाय उनकी राजनीतिक विचारधारा और जनसमर्थन पर गंभीर विश्लेषण के।
मीडिया नेरेटिव के कारण प्रभाव
यह असमान कवरेज और फ्रेमिंग कई तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सामाजिक समानता के लिए हानिकारक है:
प्रतिनिधित्व का विकृत चित्र: जब बहुजन नेताओं को केवल जाति-रूप में देखा जाता है, तो उनकी क्षमता को राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलने और नीति-निर्माण में योगदान देने से वंचित किया जाता है।
सार्वजनिक धारणा का असर: मीडिया के फ्रेमिंग से आम नागरिकों की धारणा प्रभावित होती है —कौन व्यापक समर्थन का पात्र है और कौन ‘समुदाय-निहित’ नेता है।
राजनीतिक अवसरों का असमान वितरण: नेशनल प्लेटफ़ॉर्म और नेटवर्किंग के अवसर अधिकतर उन्हीं को मिलते हैं जिन्हें मीडिया व्यापक रूप से समर्थन देता है, जिससे सत्ता के पहिए और अधिक केन्द्रित होते हैं।
क्यों बनता है यह बायस?
कुछ कारण है जो इस असमान कवरेज को जन्म देते हैं:
संपादकीय प्राथमिकताएँ: चैनल और अखबार अक्सर ‘विरल’ और ‘बिकने योग्य’ व्यक्तित्वों को प्राथमिकता देते हैं। श्रोता-वर्षा और व्यूज़ का दबाव संपादकीय निर्णयों पर असर डालता है।

सामाजिक पूर्वाग्रह :

पत्रकारों और संपादकों के अपने सामाजिक या राजनीतिक पूर्वाग्रह भी फ्रेमिंग में दिख जाते हैं।
नेटवर्क और पहुँच: जिन नेताओं के पास ऊँचे नेटवर्क और संसाधन होते हैं, वे मीडिया में बेहतर प्रस्तुति करा पाते हैं।

राजनीतिक हितों का प्रभाव:

कभी-कभी मीडिया हाउसों के राजनीतिक कनेक्शन भी यह तय करते हैं कि किसे कैसी कवरेज मिलेगी।
क्या विकल्प हैं? कुछ सुझाव

समावेशी कवरेज मानक:

मीडिया संस्थानों को प्रतिनिधित्व के लिए निर्धारित मानदंड अपनाने चाहिए ताकि केवल जातिगत पहचान पर आधारित फ्रेमिंग रोकी जा सके।

जमीनी रिपोर्टिंग को बढ़ावा:

बड़े पैनल-डिबेट की बजाय स्थानीय मुद्दों और नेताओं की जमीनी रिपोर्टिंग को प्राथमिकता दें।
बहुजन नेताओं की पॉलिसी-आधारित चर्चा: मीडिया को बहुजन नेताओं के विचारों, नीतिगत प्रस्तावों और जनसमर्थन के विश्लेषण पर ध्यान देना चाहिए — न कि केवल उनकी सामाजिक पहचान पर।

सार्वजनिक पत्रकारिता शिक्षण:

पत्रकारों के प्रशिक्षण में सामाजिक न्याय, मज़बूत स्रोत-जाँच और फ्रेमिंग के प्रभाव की शिक्षा शामिल होनी चाहिए।
इस लिए अंततः ये है कि
मीडिया का नेरेटिव शक्तिशाली है — वह किसी नेता को राष्ट्रीय बनाता है या केवल जातिगत पहचान में संकुचित कर देता है। प्रसांत किशोर के राष्ट्रीय स्तर पर उभरने की कवरेज और बहुजन नेताओं के सीमित-जातिगत फ्रेमिंग के बीच अंतर सिर्फ एक कवरेज का फर्क नहीं है; यह सत्ता व प्रतिनिधित्व के असमान वितरण का दर्पण है। एक परिपक्व लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि मीडिया समावेशी, न्यायसंगत और नीति-केंद्रित कवरेज सुनिश्चित करे — ताकि हर नेता को उसकी वास्तविक योग्यता और जनता के प्रति उसकी सेवा के आधार पर परखा जा सके, न कि केवल उसकी जाति या मीडिया-निर्मित पहचान के आधार पर।

लेखक:संदीप डंडियां
शिक्षाविद् स्वतंत्र विचारक की कलम से

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