Tuesday, September 29, 2026
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‍‍‍‍‍मूर्ख कौन? क्यो पाखंड और अंधविश्वास की जंजीरों में जकड़ता समाज कौन है जिम्मेदार

लोग अक्सर धर्म, जाति, पंथ, ब्राह्मण और व्यवस्था को दोष देकर हमारे समाज के लिए नफरत की दीवारें खड़ी करते हैं। उनके लिए यह विचारणीय है।
आखिर इन सबमें चलकर जाता कौन और क्यु है ?

कबीर ने क्यों कहा था —
“मन जाए तो जाने दे, मत जान दे शरीर। बिना चढ़ाई कामठी कैसे लागे तीर।”
कबीर साहेब पाखंड पर और भी तीखा प्रहार करते हुए कहते हैं:
“कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर॥”
और पाखंडियों को ललकारते हुए:
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”

तेरा मन जाए तो जाने दे, तू क्यों चलकर इस पाखंड और अंधविश्वास में जाता है? कबीर रैदास का यह प्रहार हर उस झूठी व्यवस्था, रस्म और ढोंग के लिए था जो आपकी समता समानता स्वतंत्रता और उन्नती मे बाधक है।
रैदास जी जाति-पाति और पाखंड के खिलाफ खड़े होकर गर्जते हैं:
“जाति पाति पूछै न कोई, हरि को स्वयं को जाने सो हरि का होई॥”
और
“ऊँचा नीचा नान्हा बड़ा, सब में एक समान।
रैदास देखै राम को, ताहि मिले भगवान॥”
(दोषी स्वयं होकर फिर दोष क्यों दूसरों को देते हैं?)
आखिर मूर्ख कौन?

अगर किसी व्यक्ति ने हमें मूर्ख कहा और हमने उसकी बात मानकर पत्थर मारना व मूर्खों जैसे कार्य शुरू कर दिए, तो मूर्ख कौन?
बुद्ध ने कहा था — “अंधे विश्वास मत करो, चाहे वह मेरी ही बात हो, जब तक वह तुम्हारे तर्क और अनुभव पर खरी न उतरे।” फिर भी हम गाली को अपनी नियति मान लेते हैं। मूर्ख कौन?
किसी ने हमें नीच, अधम कहकर जातियों में बांटा, हम आज तक उसी जाति का लेबल लगाकर घूम रहे हैं। अपनी आने वाली पीढ़ियों को यही अपमान “दक्षिणा” मे दे रहे हैं कि “हम नीच हैं”। मूर्ख कौन?

किसी ने अवतारवाद, चमत्कार और पाखंड की कहानियां सुनाईं, हम उसी का अनुसरण कर रहे हैं। मूर्ख कौन?
आंबेडकर ने “जाति का विनाश” में लिखा — “जब तक शास्त्रों की पवित्रता को चुनौती नहीं दी जाएगी, जाति नहीं मिटेगी।”
वैज्ञानिक तथ्य: मानव जीनोम प्रोजेक्ट सिद्ध करता है कि समस्त मानव एक ही वंश से हैं। किसी भी दो मनुष्यों के DNA में 99.9% समानता होती है। फिर यह जातिगत भेदभाव कैसा? मूर्ख कौन?

कोई हमारे घर / समाज मे आकर उच्च स्थापर बैठकर हमसे ही पैसे लेता है,
सूखा अनाज लेता है, हमारी मदद से उसका पुरा जीवन चलता है।
लेकिन पैसे व अनाज में छूत नहीं लगती। (मगर जब हम पानी या खाना खिलाने को कहते हैं तो मुंह पर कहता है — “हम आपका नहीं खा सकते, क्योंकि तुम कौए, नीच और अधम हो। हम ऊंचे कुल के संत-गुरु-पुरोहित-गर्ग हैं।” ( हम सिर्फ हाथ जोड़कर होकम साहब कहकर हंस देते है स्वीकार कर लेते है ) ।
क्यो हमारा स्वाभिमान मर जाता है। हम समानता के लिए सवाल क्यों नहीं करते।
तीखा सवाल करो: हम मनुष्य कैसे नहीं? तुम मनुष्य और महान होतो कैसे हो?

कबीर, रैदास, फुले जैसे महापुरुष बार-बार चिल्लाते रहे — “मानव-मानव एक है।” फिर भी हम चुप हैं। मूर्ख कौन?
ऐसे सैकड़ों सवाल हैं, मगर कोई पूछना नहीं चाहता। आखिर क्यों?
क्योंकि हम पढ़े-लिखे नहीं, सिर्फ लिखे-पढ़े हैं।
हम ग्रंथों में लिखी कहानियों, सुनी-सुनाई परंपराओं को बिना सवाल किए गुलामो की तरह मानते चले जाते हैं।
फिर मूर्ख कौन?

जबकि सच्चा पढ़ा-लिखा व्यक्ति पढ़कर सवाल करता है, तर्क की कसौटी पर परख करता है, सत्य-असत्य का मिलान करता है, फिर सत्य को स्वयं लिखकर नया इतिहास रचता है।
ठीक वैसे जैसे बुद्ध, कबीर, रैदास, फुले, पेरियार, आंबेडकर और कांशीराम ने किया। मूर्ख कौन?

हम बच्चे पैदा कर सकते हैं, परवरिश कर सकते हैं, मगर नाम अनपढ़ रखेगा। हम नाम रखने लायक भी नहीं हुए। फिर मूर्ख कौन?

करोड़ों रुपये खर्च कर हम मकान बना सकते हैं, मगर कब बनाना, कब प्रवेश करना — यह अनपढ़ एजेंट बताएगा। हम स्कूटर-मोटरसाइकिल-BMW खरीद सकते हैं, मगर कब खरीदना — निर्णय हम नहीं ले सकते। मूर्ख कौन?

हम आज भी ग्रह दोष  सांप, गधा, बिल्ली आगे निकल जाए तो रुक जाते हैं। किसी के छींकने पर इंतजार करते हैं कोई और आगे निकले तब हम जाएगे। क्या आगे निकलने वाला मरजाता है । नही
फिर मूर्ख कौन?

स्त्री को भरपूर स्वतंत्रता देनी चाहिए। स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं होना चाहिए।
मगर पति के होते हुए दूसरे बाबा, पंडित या पत्थर को धणी पति मानकर पूजे तो वो पत्नी किसकी? हम ही हजारों रुपये खर्च कर उन्हें भेजते हैं ऐसी व्यवस्था में। फिर मूर्ख कोन

बच्चा न हो तो मठ-मंदिर-ओझा के पास भेजते हैं।
वैज्ञानिक तथ्य कहते है : आधुनिक चिकित्सा (IVF, ICSI आदि) से पुरुष 70-80 वर्ष की आयु तक भी संतान प्राप्त कर सकते हैं। फिर भी हम ढोंगियों के चक्कर में पड़े रहते हैं। मूर्ख कौन?

हम आज भी मरने के बाद माता-पिता को स्वर्ग-सतलोक भेजने के लिए अनपढ़ एजेंटों को 5000 से 5,00,000 रुपये तक खर्च कर “स्वर्ग” भेज ने के लिए स्वर्ग के दलाल एजेन्टो के पास जाते है।
जबकी वैज्ञानिक तथ्य: विज्ञान स्वर्ग, नरक या पुनर्जन्म को कोई प्रमाण नहीं मानता। मृत्यु के बाद चेतना समाप्त हो जाती है। ये सब मनुष्य द्वारा रचे गए भ्रम हैं।

कई श्रवण बेटे बहुए जीते जी मां-बाप सास ससूर परिवार पर 100 रुपये खर्च नहीं करते । साल मे एकबार खबर लेने तक नही जाते, मांबाप गाँव मे अभावो और कुपोषण मे तड़फ तडफ कर मर जाते है । बेटे बहु नाती पोते शहरो मे मस्ती मारते है । मगर मरने के बाद गंगाजी जाते है गंगा उद्यापन कर 18 से 20 परंगणों को बुलाकर नाम कमाते हैं।
और समाज ऐसे व्यक्ति जिसने अपने माता पिता परिवार को तडफाया हो ।
ऐसे व्यक्ति को पगड़ी बांधकर सम्मानित करता है क्या ये उचीत है ।मात्र भोजन के बदले ।
मूर्ख कौन?

हम आज भी जीवित मनुष्य की टांग खींचते हैं, मरने के बाद मगरमच्छ के आंसू बहाते हैं।

हमें जीवित इंसान नहीं, फोटो फ्रेम वाले मनुष्य चाहिए।

हम मानव को मानव कब समझेगे
तो आखिर मूर्ख कौन?

कई ऐसे पाखंड और अंधविश्वास में हम आज भी अपनी मर्जी से फंसे हुए हैं।
फिर दोष अन्य पर क्यो लादते है ।
इसका एक ही इलाज है।

शिक्षित बनो — आंबेडकर कहते थे, “शिक्षा अंधकार से मुक्ति है।”
सवाल करो — बुद्ध का संदेश: “जांचो, परखो, तब मानो। अप्प दीपो भवः”
संगठित रहो।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाओ — संविधान का मौलिक कर्तव्य (51A(h))।
मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष करो।

(किसी को दोष देकर नफरत मत फैलाओ। दोषी हम स्वयं हैं।)

स्वयं जागरूक बनो, स्वयं निर्णायक बनो। इस भ्रमजाल से बाहर निकलो और समाज को भी निकालो। यही उन्नति का मार्ग है।

मे जाग गया और जान गया हूँ मे कोन हूँ । और सत्य क्या है । इसलीए आपको भी कहरहा हूँ जाग जाओ अभी भी वक्त है । आपके बिना जागे समाज और आपकी स्वयं की उन्नती संभव नही ।
जय भीम! जय संविधान! जय गुरु रविदास ।
साहेब बंदगी कोई अपने पर नही लेवे मेरे शब्द कडवे जरूर है मगर सच्चाई यही है ।

लेखक :
( आर.एल. यादव झडस ) (सामाजिक चिंतक) लेखक जर्नलीष्ट :
आपसे विनंती है बेहतर सामाजिक चैतना हेतु हमे मार्गदर्शन करे । :8890304717

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