मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अक्सर जब व्यक्ति किसी कला, ज्ञान या हुनर में माहिर हो जाता है, तो धीरे-धीरे उसके भीतर ‘मै’ की भावना यानी घमंड का जन्म होने लगता है। उसे लगता है कि उसकी यह काबिलियत ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन प्रकृति का नियम इसके बिल्कुल विपरीत काम करता है। जिस दिन आप यह मान लेते हैं कि आप सर्वश्रेष्ठ हैं, उसी दिन से आपकी सीखने की प्रक्रिया भी समाप्त हो जाती है। जैसे पत्थर को उसका अपना ही भारीपन ले डूबता है, वैसे ही इंसान को उसका हुनर नहीं, बल्कि उस हुनर का ‘घमंड’ नीचे गिरा देता है। अहंकारी व्यक्ति खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, जिससे समाज और करीबी लोग उससे दूरी बना लेते हैं।
विनम्रता ही इंसान का असली हुनर है । हुनर हमें समाज में ऊंचा उठाने के लिए होता है, दूसरों को नीचा दिखाने के लिए नहीं। जैसे फल से लदा हुआ पेड़ हमेशा नीचे की ओर झुका रहता है, वैसे ही सच्चे हुनरमंद इंसान की पहचान उसकी विनम्रता से होती है । अपनी काबिलियत पर विश्वास रखना अच्छी बात है, लेकिन उसे घमंड में मत बदलने दीजिए। याद रखिए, तैराक भी अगर पानी में अकड़ कर खड़ा रहेगा, तो डूब जाएगा और बचने के लिए उसे भी पानी के बहाव के साथ लचीला होना पड़ता है। अपने हुनर को अपनी ताकत बनाइए, अपनी डूबने की वजह नहीं।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

