Thursday, June 11, 2026
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मकान हो या इंसान, कई बार टूटकर ही उसकी एक नई और मजबूत पहचान बनती है क्योंकि टूटना अंत नहीं, बल्कि है एक नई शुरुआत

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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​यह संसार का एक कड़वा लेकिन खूबसूरत नियम है कि “मकान हो या इंसान, कई बार टूटकर ही उसकी एक नई और मजबूत पहचान बनती है।” जब एक पुराना मकान ढहता है, तो वह केवल मलबे का ढेर नहीं होता, बल्कि एक आधुनिक, भव्य और मजबूत इमारत की नींव रखने का अवसर होता है। ठीक इसी तरह, इंसान का टूटना भी उसके जीवन का अंत नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे ‘असाधारण’ के बाहर आने की शुरुआत है। लोग केवल आपकी वर्तमान स्थिति, आपके बिखरे हुए साधन या आपकी असफलता का शोर देख सकते हैं। वे उस संघर्ष को नहीं देख पाते जो आप हर दिन खुद से लड़ रहे हैं। ​सच्चाई यह है कि लोग केवल आपकी बाहरी परिस्थिति देख सकते हैं, आपके भीतर की अदम्य इच्छाशक्ति को नहीं।
यह भी सम्भव है कि ​परिस्थितियाँ आपको कुछ समय के लिए झुका सकती हैं, लेकिन आपके भीतर की इच्छाशक्ति वह अंगारा है, जो विपरीत परिस्थितियों की फूंक से बुझने के बजाय और तेजी से धधक उठता है। ​जब कोई व्यक्ति गहरे संकट या मानसिक टूट-फूट से गुजरता है, तो उसके भीतर के भ्रम और कमजोरियाँ भी टूटकर बिखर जाती हैं। इस प्रक्रिया से जो इंसान दोबारा खड़ा होता है, वह पहले से कहीं अधिक
​धैर्यवान होता है, क्योंकि उसने सबसे बुरा दौर देख लिए हैं। ​चोट खाए बिना पत्थर भी मूरत नहीं बनता। इसलिए, यदि जीवन में कभी ऐसा मोड़ आए, जहाँ सब कुछ बिखरा हुआ लगे, तो निराश ना हों। दुनिया को आपकी लाचारी देखने दें, क्योंकि जब आप अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर दोबारा खड़े होंगे, तो वही दुनिया आपकी नई और फौलादी पहचान को सलाम करेगी।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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