Tuesday, September 29, 2026
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झगड़े और मनमुटाव होना हर रिश्ते का हिस्सा हैं, लेकिन उन्हें मन में बिठाकर अपनों से दूर हो जाना नहीं है कोई समझदारी

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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“बर्तन एक जगह होंगे, तो खटकेंगे ही” यह पुरानी कहावत मानवीय रिश्तों पर पूरी तरह सटीक बैठती है। जहाँ चार लोग साथ रहते हैं, वहाँ विचारों में भिन्नता, बहस और मनमुटाव होना स्वाभाविक है। प्रेम, दोस्ती, परिवार या वैवाहिक जीवन में नोक-झोंक होना हर रिश्ते का एक अनूठा हिस्सा है, लेकिन असली समझदारी इस बात में नहीं है कि रिश्ते में कभी झगड़ा ना हो, बल्कि समझदारी इसमें है कि उस झगड़े को मन में पालकर अपनों से दूरी ना बनाई जाए। जब हम किसी छोटी सी बात या बहस को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं, तो वह रिश्ता धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है और जब हम बात करना बंद कर देते हैं, तो मौन हमारे अहंकार को तो बढ़ा देता है, लेकिन उस इंसान को हमसे दूर कर देता है, जो कभी हमारे दिल के करीब था। संवाद टूटने से दोनों पक्षों के मन में काल्पनिक बातें और कड़वाहट बढ़ने लगती हैं, जिससे दूरियां और चौड़ी हो जाती हैं ।
अपनों से रूठकर कोई भी इंसान अंदर से खुश नहीं रह सकता। यह खामोशी मानसिक तनाव और अकेलेपन को जन्म देती है। रिश्ते कांच की तरह होते हैं, जो सँभालने पर चमकते हैं और अहंकार की चोट से बिखर जाते हैं। झुक जाना कमजोरी नहीं, बल्कि रिश्ते को बचाने की ताकत है। जिंदगी बेहद अनमोल और छोटी है। आज के इस भागदौड़ भरे दौर में वैसे ही सच्चे रिश्ते बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। मनमुटाव किसी रिश्ते का अंत नहीं, बल्कि उसे और गहरा करने की एक परीक्षा है। जो लोग समझदार होते हैं, वे परिस्थितियों को बदलते हैं, अपनों को नहीं। अपनों से दूर होकर ‘अकेले’ जीतने से कहीं बेहतर है कि थोड़ा झुककर ‘अपनों के साथ’ जिया जाए। प्रेम, क्षमा और संवाद ही वह चाबी है जो हर मनमुटाव का ताला खोल सकती है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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