मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जब हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास करते हैं, तो हमारे मन को एक असीम शांति का अनुभव होता है। दूसरों के सुख में सुखी होने के लिए ‘परानुकंपा’ और ‘उदारता’ की आवश्यकता होती है। यह हुनर व्यक्ति के भीतर से ईर्ष्या, द्वेष और तुलनात्मक सोच जैसी नकारात्मक भावनाओं को समाप्त कर देता है। जब ईर्ष्या नहीं रहती, तो दुःख का कारण भी स्वतः समाप्त हो जाता है। इसके साथ ही जो व्यक्ति दूसरों की सफलता और खुशी में दिल से शामिल होता है, वह समाज में सभी का प्रिय बन जाता है। उसके संबंध अधिक गहरे और सच्चे होते हैं। ऐसा व्यक्ति कभी खुद को अकेला महसूस नहीं करता क्योंकि उसकी सकारात्मकता दूसरों को उसकी ओर आकर्षित करती है।
जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियाँ हर किसी के सामने आती हैं, लेकिन जो दूसरों के दुःख को बाँटने और उनकी खुशी को बढ़ाने का हुनर जानता है, वह अपने दुखों को भूलना भी सीख जाता है। उसका दृष्टिकोण जीवन के प्रति सकारात्मक हो जाता है, जिससे बड़े से बड़ा दुःख भी उसे तोड़ नहीं पाता । दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूँढना कोई साधारण बात नहीं है, यह एक ‘हुनर’ है जिसे साधना पड़ता है। यह सोच इंसान को ‘स्व’ से ‘सर्व’ की ओर ले जाती है। जिस दिन मनुष्य इस कला को सीख लेता है, उसका जीवन सच्चा, संतुष्ट और सदैव आनंदित हो जाता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

