मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जो व्यक्ति अपने ही घर में प्रेम, शांति और आपसी विश्वास की नींव नहीं रख पाता, उसका बाहरी समाज में सदाचारी, दयालु या महान होने का दावा करना महज़ एक आडंबर और ढोंग है। बाहरी दुनिया में ‘अच्छा’ बनना बहुत आसान है, क्योंकि वहाँ संबंध अक्सर औपचारिक, स्वार्थ-आधारित और सीमित समय के लिए होते हैं। वहाँ मुस्कुराहटें उधार की हो सकती हैं और व्यवहार नपा-तुला। लेकिन घर वह जगह है जहाँ किसी मुखौटे की गुंजाइश नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी, बच्चों या माता-पिता के साथ सम्मानजनक और शांतिपूर्ण संबंध नहीं रख सकता, तो उसके द्वारा समाज में बांटी जाने वाली ‘शांति की बातें’ केवल खाली शब्द हैं।
”वृक्ष की जड़ें यदि सूखी और खोखली हों, तो उसकी बाहरी पत्तियों पर पानी छिड़कने से वह हरा-भरा नहीं कहलाता।” इसी प्रकार, घर से उपेक्षित प्रेम और शांति को बाहरी वाहवाही और प्रशंसा से कभी पूरा नहीं किया जा सकता। ऐसा सदाचार केवल समाज में अपनी छवि चमकाने का एक माध्यम मात्र होता है।सदाचार और महानता की शुरुआत हमेशा अपने ‘घर’ से होती है। जो दिल अपने परिवार के सदस्यों के लिए प्रेम और विश्वास से नहीं धड़क सकता, वह पूरी दुनिया के लिए कभी सच्चा नहीं हो सकता। यदि वास्तव में जीवन को सार्थक और चरित्र को पवित्र बनाना है, तो बाहरी दिखावे को छोड़कर सबसे पहले अपने घर को प्रेम, शांति और विश्वास का मंदिर बनाना होगा।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

