Tuesday, September 29, 2026
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हमारे अच्छे भाव और परोपकारी कर्म तब फीके पड़ जाते हैं, जब हमारी वाणी में होता है कड़वाहट

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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कई बार हम सोचते हैं कि यदि हमारी नीयत साफ है और हम किसी का बुरा नहीं चाहते, तो रिश्ते हमेशा मजबूत रहेंगे, लेकिन जीवन की कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे अच्छे भाव और परोपकारी कर्म भी तब फीके पड़ जाते हैं, जब हमारी वाणी में कड़़वाहट होती है। अच्छे भाव मन के भीतर छिपे होते हैं और कर्म समय आने पर दिखाई देते हैं, लेकिन वाणी वह पहली चीज़ है जिससे सामने वाला इंसान सीधा जुड़़ता है। कड़़वे और चुभते हुए शब्द किसी के भी दिल में ऐसा घाव कर देते हैं जिसे भर पाना नामुमकिन हो जाता है । कहा भी गया है कि “तीर का घाव भर सकता है, लेकिन तलवार से भी तीखी वाणी का घाव कभी नहीं भरता।”
इंसान एक-दो बार कटु वचनों को सहन कर सकता है, लेकिन जब यह आदत बन जाती है, तो लोग धीरे-धीरे भावनात्मक रूप से दूर होने लगते हैं और जहाँ सम्मान नहीं होता, वहाँ रिश्ता खोखला होने लगता है। यह सच है कि केवल मीठा बोलने से कोई अच्छा इंसान नहीं बन जाता—नीयत और कर्म का सच्चा होना बेहद ज़रूरी है। लेकिन वाणी वह पुल है जो आपके अच्छे भावों और कर्मों को दूसरों तक पहुँचाती है। यदि यह पुल ही टूट जाए, तो आपकी अच्छाई दूसरों के दिलों तक कभी नहीं पहुँच पाएगी। रिश्तों को लंबा और अटूट बनाए रखने के लिए मन की पवित्रता और कर्मों की सार्थकता के साथ-साथ वाणी में मधुरता और संयम का होना अनिवार्य है। यदि हम अपने शब्दों का चुनाव सोच-समझकर करें, तो हमारे अच्छे भाव और कर्म सही मायने में रिश्तों को महका सकते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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