Tuesday, September 29, 2026
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देश में दोहरी मानसिकता क्यों?कानून सभी के लिए बराबर हे तो एक तरफ*आतंकवादी, नक्सली खालिस्तानी माओवादीदूसरी तरफ राष्ट्रवादी देशभक्त क्रांतिकारी क्योंअपराधी अपराधी होता है*

वह चाहे कोई भी धर्म मजहब जाती समुदाय समाज को क्यों न हो

लेख: संजय सोलंकी
भारत एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश है, जहां सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन जब हिंसा, हथियार और उग्र आंदोलनों की बात आती है, तो समाज और मीडिया के एक हिस्से की भाषा तथा दृष्टिकोण को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं।
बहुत से लोग यह प्रश्न करते हैं कि यदि कोई मुस्लिम हथियार उठाता है तो उसे “आतंकी” कहा जाता है, कोई आदिवासी हथियार उठाता है तो “नक्सली”, कोई सिख हथियार उठाता है तो “खालिस्तानी” और कोई दलित हथियारबंद संघर्ष की बात करता है तो “माओवादी” कह दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर कुछ मामलों में या सवर्ण समुदाय से जुड़े लोगों को “राष्ट्रवादी”, “देशभक्त” या “क्रांतिकारी” जैसे विशेषण मिल जाते हैं। यह धारणा समाज में दोहरे मापदंडों की बहस को जन्म देती है।
हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके धर्म, जाति या समुदाय से नहीं, बल्कि उसके कार्यों से तय होनी चाहिए। कानून की नजर में हिंसा, आतंकवाद और गैरकानूनी गतिविधियां किसी भी समुदाय द्वारा की जाएं, वे गलत हैं। किसी अपराध या हिंसक कृत्य का मूल्यांकन व्यक्ति की जाति, धर्म या सामाजिक पृष्ठभूमि देखकर नहीं, बल्कि उसके कृत्य और कानून के आधार पर होना चाहिए।
समस्या तब पैदा होती है जब मीडिया, राजनीति या सामाजिक पूर्वाग्रह किसी घटना की व्याख्या को प्रभावित करने लगते हैं। एक जैसी घटनाओं के लिए अलग-अलग शब्दों का उपयोग लोगों के मन में भेदभाव और अन्याय की भावना पैदा करता है। यही कारण है कि समाज में निष्पक्षता और समान दृष्टिकोण की मांग लगातार उठती रहती है।
भारत के संविधान का मूल सिद्धांत समानता है। यदि कोई व्यक्ति हथियार उठाकर कानून अपने हाथ में लेता है, तो उसकी जाति, धर्म या समुदाय चाहे जो भी हो, कानून का व्यवहार समान होना चाहिए। उसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ता है, तो उसे भी समान सम्मान और अवसर मिलना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम व्यक्तियों का मूल्यांकन उनकी पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि उनके कार्यों के आधार पर करें। न्याय, समानता और संविधान की भावना तभी मजबूत होगी जब सभी के लिए एक ही पैमाना लागू होगा।
“न्याय का तराजू तभी संतुलित रहेगा, जब उसमें व्यक्ति की जाति या धर्म नहीं, उसके कर्मों का वजन किया जाएगा।”

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