

बारिश भी नहीं रोक सकी न्याय की आवाज, बच्चों की मौत की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की उठी मांग
संवाददाता सत्यशील गोंडाने, बालाघाट
बालाघाट। आदिवासी अंचलों में नौनिहालों की मौत के मुद्दे को लेकर गुरुवार को बालाघाट में व्यापक बंद का असर देखने को मिला। विभिन्न सामाजिक, आदिवासी एवं नागरिक संगठनों के आह्वान पर आयोजित बंद में जिले के दूर-दराज क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। लगातार बारिश के बावजूद लोगों के कदम नहीं रुके और बच्चों की मौत के मामले में न्याय, निष्पक्ष जांच तथा जिम्मेदारी तय करने की मांग जोरदार ढंग से उठाई गई।
बंद के दौरान बड़ी संख्या में नागरिकों और विभिन्न संगठनों की सहभागिता दिखाई दी। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यह मामला किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि मासूम बच्चों के जीवन और उनके परिवारों को न्याय दिलाने का विषय है। लोगों ने सवाल उठाया कि आदिवासी एवं बैगा बाहुल्य क्षेत्रों में बच्चों की मौत के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं और यदि कहीं स्वास्थ्य व्यवस्था या प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसकी जवाबदेही किसकी है।
राजनीति से ऊपर उठकर जवाबदेही की मांग
प्रदर्शनकारियों ने आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाओं, कुपोषण, बीमारियों की समय पर पहचान, चिकित्सकीय सेवाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठाए। उनका कहना है कि बच्चों की मौत की घटनाओं की गंभीरता को देखते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच आवश्यक है।
लोगों ने मांग की कि जांच में बच्चों की मौत के वास्तविक कारणों का पता लगाया जाए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही प्रमाणित होती है तो संबंधित जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
बारिश बनी गवाह, नहीं थमे लोगों के कदम
बंद के समर्थन में जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से पहुंचे लोगों में बच्चों की मौत को लेकर आक्रोश और पीड़ा दिखाई दी। खराब मौसम और बारिश के बावजूद नागरिक प्रदर्शन में शामिल हुए। लोगों का कहना था कि यदि किसी परिवार का मासूम बच्चा स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी अथवा समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण जान गंवाता है, तो पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
प्रशासन और स्वास्थ्य व्यवस्था से उठे कई सवाल
नौनिहालों की मौत के मामले को लेकर लोगों ने प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े किए। प्रदर्शनकारियों ने पूछा कि क्या प्रभावित क्षेत्रों में समय पर उपचार उपलब्ध कराया गया, क्या गांवों में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं मौजूद थीं, क्या बीमारियों की समय रहते पहचान और निगरानी की गई तथा क्या संबंधित अधिकारियों ने अपने दायित्वों का समुचित निर्वहन किया।
इन सवालों के वास्तविक उत्तर जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे। इसी वजह से नागरिकों ने मामले की समयबद्ध जांच और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने की मांग की है।
स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी पर भी सवाल
बच्चों की मौत के मामले के बाद ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य व्यवस्था की नियमित निगरानी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, चिकित्सकीय अमले की मौजूदगी और मरीजों को समय पर उपचार मिलने की व्यवस्था की लगातार समीक्षा जरूरी है।
हालांकि किसी अधिकारी या विभाग को जांच पूरी होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। ऐसे में अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह जनआक्रोश को गंभीरता से लेते हुए मामले की तथ्यात्मक जांच कर वास्तविक स्थिति जनता के सामने रखे।
आश्वासन नहीं, अब कार्रवाई की मांग
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि बच्चों की मौत किसी भी समाज के लिए सामान्य घटना नहीं हो सकती। प्रभावित परिवारों को न्याय दिलाने के साथ-साथ ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने और दूरस्थ क्षेत्रों में प्रभावी निगरानी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता है।
बंद के दौरान उठी आवाज का सार यही रहा कि नौनिहालों की मौत पर राजनीति नहीं, बल्कि न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित हो। अब लोगों की निगाहें प्रशासन की आगामी कार्रवाई और जांच के निष्कर्षों पर टिकी हैं।

