आलेख -डॉ. हस्ती मल आर्य ‘हस्ती’
पुरुष स्तनधारी जगत में सर्वोन्न्त,अति महत्व पूर्णजीवों मे उन्नत विकसित जीव है। मानव नर को पुरुष कहते है। नर का मायना नारी नहीं होना ही नहीं है। पुरुष मन नर में न केवल भावनाएं, इच्छाएं, तमन्नाएं, अभिलााषाएं हैं, बल्कि उनकी मानसिकताएं, कुंठाए, ईर्षाएं, चेष्टाएं ; खुशी, गम, प्रेम, आकुलता- व्याकुलताएं,धीरज-अधीरता,रोना-हंसना,प्रशंसा-बुराई, मुस्कुराना-लजाना-खिलखिलाना,कुंठित होना या विस्मय बोध इत्यादि- इत्यादि भावों की अनुभूति अथवा अभिव्यक्ति का फिजियो केमिको कायिक प्रभाव अनुभूत ही मन (विचार) या भाव ही मन के द्वारा किया जाता है। कहा जा सकता है कि यही “मन” है।
विज्ञान अनुसार पुरुष मन यह सिरेटोनिन काइनेज व टेस्टोस्टेरोन हारमोन नियंत्रित क्रिया -प्रतिक्रिया है।
वैज्ञानिकों अनुसार कहते है एक शरीर में करीब 7 सात अरब से अधिक जीवाणु होते है, इतनी ही करीब विश्व की जनसंख्या है । इस तरह सात अरब जीवित चेतनाओं का भाव यह ‘मन’ है ।
पुरुष मन को “एक जटिल तथा कर्त्तव्य, इच्छा तर्क तथा भावनाओं को ही पुरुष मन कहा गया है। मदन मोहन, अभ्युदय साहित्य में पुरुष मन को एक रणभूमि कहा “जहां कर्त्तव्य,इच्छा, डर और तर्क रोज़ आमने-सामने खड़े होते है।”
दर्शन शास्त्र में इसे आत्मा, चेतना, या जीव तत्व बताया जो शरीर के भीतर निवास करता है तथा शाश्वत है, अचल और निष्क्रिय माना गया है। जो प्रकृति (संसार/पदार्थ) से मिलकर जीवन सृजन करता है । यहां अचल का भावार्थ स्थिर सोच से है जो किन्हीं विषयों के विषय से है । मन को अचल कहना विवादास्पद है,क्योंकि मन को सदा ही चंचल ही माना गया।
कबीर सहाब, संत शिरोमणि रविदास तक ने मन को चंचल ही कहा ।
वैज्ञानिकों ने जहां मन को जीवित चेतनाओं का केंद्र बताया। इसे नगर (परकोटा ) कहा गया और इस बाह्य परकोटें में भीतरी परकोटे को ही ‘मन’ कहा गया । इस मन में पुरुष मनभावनात्मक, मानसिक तथा अति आध्यात्मिक होता है ।
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
कहे कबीर हरि पाइयें, मन की परतीत।
पुरुष मन मानविक प्रभाव के बारे में भावनात्मक दुख सुख व तनाव की संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रेम व ऊर्जा का प्रवाहक मन है, इसका मनोवैज्ञानिक अवचेतन मन पर प्रभाव तथा लोक मान्यताएं सांकेतिक, सपने, प्रकृति के उपदेश है,प्रेम तथा इतिहास पौराणिक संदर्भ में है मन से उपजे प्रेम का भावनात्मक प्रमाण है । मन सकारात्मक, मानसिक व नकारात्मक प्रभावी रुप से प्रभाव डालते है।
पुरुष मन वृहत सोच के साथ वृहत मानसिक, सामाजिक, वैश्विक सोच तथा जैव वैश्विक तथा जैविक सोच समझ व विचारधारा है । योगेश्वर जी अपनी कविता में ने पुरुष मन को बड़े ही सुंदर ढंग ‘पत्थर’ बताय़ा। इस कठोरता को मानवीय आवश्यकता समझाया ताकि ताकि स्त्री व बच्चों के लिए ,परिवार व समाज हितकारी कदम बताया। पुरुष मन जब दुखी पुरुष मन को स्त्री मन की तरह इसे कोई नहीं संभालता, तब पुरुष स्वयं को दिलासा देकर अथक संघर्ष पथ चलता बताया।
पुरुष मन व स्त्री मन में हॉर्मोनल अंतरों के साथ भौतिक-रसायनिक-कायिकी भी अंतर्निहीत है। हामोनल के साथ भावनाओं के प्रदर्शन,तनाव समाधानों में,सोच के तरीकों व मानसिक स्वास्थ्य बहुत सारे लघु-दीर्घ अंतर है ।
समामाजिक रुप से पुरुष मन कई दोषों से दोषारोपित किया जाता रहा। जैसे कठोर, फरैबी, गैर जिम्मेदार, अकड़ू मुख्य रुप से। यही स्त्रियाों द्वारा अपनी अगली जनरेशन को यही सिखाया जाना बेहद गैर जिम्मेदाराना कृत्य मैं मानता हूं । इधर इस तरह की बातों को पुरुष मन तथा काफी सुलझी हुई महिलाएं साहित्यकारां गलत व भ्रामक मानती है।
वैसे यह तोता-मैना की कहानियां जैसा अंतहीन विवाद का मुद्दा है।
पुरुषों की सोच ‘मन’ प्रवृति या मनोवृति- शिथिल सोच, निर्णय शक्ति, दूरदृष्टि की कमी, कठोर निर्णय लेने में असमर्थता, व हिच किचाहट तथा सब को खुश रखने की लालसा इनका (स्त्री मन सा ) सकारत्मकता के साथ नकारात्मक पहलू ही है।
पारंपरिक रूढीवाद पुरुष-स्त्री मन में व्याधि सा हैं। पुरुष मन इसके चलते थोड़ा प्रभाव क्षेत्र में है, किंतु पुरुष मन स्त्री मन प्रति सदा सम्मान जनक सोच के साथ चलने को चलता है। कुछ परिस्थिति जन्य सामाजिक सोच के चलते सोच के अुकूलन में जहां समाजिक कारणों को को ही परिवर्तन करने की आवश्यकता हैं। मन का दोषारोपण निरर्थक है।
आज पुरुष मन जहां लचीला , स्त्री मन प्रति नरम, सौम्य व लचीला ,पोषक व सुधारक रहता है ; वहीं स्त्री मन पुरुष मन सा बनता जा रहा है। स्त्री जन्य भावना अनुकूल ,जैव कायिकी कार्यों से दूर हों समाज में नया विमर्श पैदा कर रहें है। स्त्री मन की ममता, धीरज, आत्मीयता व त्याग भाव की गठरी स्त्री उतार फेंकने को आतुर है ; जो नई टकराहट को हवा देने को ऊतारूं है स्त्री मन समस्त उम्मीदे पुरुष मन से कर रही हैं, पर अपनी विरासत में अगली जनरेशन को कुछ नहीं देने जा रही, सिवाय कुंठा व विवाद के।
वे सब उम्मीदें पुरुष मन से कर रही हैं, पुरुषों में नजरियां बदलने का दौर चल रहा है। वे स्त्री मन को सम्मान जनक स्थान देने के लिए।
अंत में मेरा यही मानना हैं कि स्त्री मन में स्वाभिमान, गरिमामय परिवर्तन लाजिमी तक होने ही चाहिए जिसमें पुरुष मन को कोई मानसिक, सामाजिक , शारीरिक या भौतिक असम्मानजनक, गरिमाहीन परिवर्तन या ठेस न लगे। समाज के स्त्री पुरुष का समसामयिक संपूर्ण स्वतंत्रता की सीमा तक (स्वच्छंदता नहीं) को समान सम्मान मिले, अधिकार, सुविधाएं व अवसर मिले। संविधान शिल्पी व निर्माता डॉ. अंबेडकर ने संविधान के साथ इसीलिए कर्त्तव्य व दिशा निर्देशक तत्वों का समावेश किया। इन्हे समानुपातिक बताया। पुरुषों का पल्लवन, विकास, समृद्धि भी स्त्री मन की खुशी,स्वास्थ्य, समृद्धि व स्वतंत्रता पर निर्भर है, इसीलिए भारत में कहा जाता है,-
यत्र नार्यस्तू पूज्यन्ते , रमन्ते तत्र देवता:।
“जहाँ नारियां पूजी जाती है वहाँ देवता लोग रमण करते है। विराजते है।” अर्थात वहां जनता सुखी समृद्ध ,स्वास्थ,सुखद जीवन व सुशासन होंगा । उस राष्ट्र का नाम वैश्विक शिखर होंगा। इसी लिए पुरष मन, स्त्री मन ही नही मानव मन की ही सोच हमें वैश्विक मन ही स्वस्स्थ,स्वच्छ, स्वततंत्र,सहज,सरल तथा समता-समानता, के साथ संविधान सम्मत पल्लवित रहें। विकासोन्मुखी सर्व मंगलकारी मंगलमयी हों ।
भवतु सब्बेमंगळं।
मौलिक रचनाकार
डॉ. हस्ती मल आर्य ‘हस्ती’
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