Monday, September 28, 2026
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परंपरागत समाज और आधुनिकता की अंधी दौड़ में रिश्तों की नींव आदर सत्कार पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की ‘आवक’ यानी उसकी आमदनी और हैसियत पर गई है टिक

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आज के आधुनिक समाज में एक कड़वा बदलाव देखने को मिल रहा है। वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि रिश्तों की नींव अब ‘आदर’ पर नहीं, बल्कि इंसान की ‘आवक’ यानी उसकी कमाई पर टिक गई है। प्राचीन काल में परिवारों और रिश्तों में प्रेम, त्याग, संस्कार और पारस्परिक सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया जाता था। बड़े-बुजुर्गों का आदर उनकी उम्र और अनुभव के कारण होता था, ना कि उनकी तिजोरी के कारण, परंतु आज भौतिकवादी युग में मानवीय मूल्यों का स्थान पैसों ने ले लिया है। व्यक्ति की योग्यता और उसके चरित्र का पैमाना उसका बैंक बैलेंस बन चुका है। जिस इंसान की आवक अच्छी है, समाज और परिवार में उसे पलकों पर बिठाया जाता है। उसके हर सही-गलत फैसले को सही मान लिया जाता है।
इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर है, तो उसके गहरे ज्ञान और सच्चे आदर की भी अनदेखी कर दी जाती है।यह स्थिति रिश्तों में खोखलेपन को दर्शाती है। जब रिश्ते स्वार्थ और पैसों के तराजू पर तोले जाते हैं, तो उनमें से आत्मिक जुड़ाव खत्म हो जाता है। यदि हमें एक स्वस्थ और संवेदनशील समाज का निर्माण करना है, तो हमें इस सोच को बदलना होगा। रिश्तों को आवक के चश्मे से देखना बंद करके, पुनः आदर और निश्छल प्रेम पर आधारित करना होगा क्योंकि धन तो आनी-जानी छाया है, परंतु सच्चे रिश्ते ही जीवन की असली पूंजी हैं।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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