अधिकार रैली में पारंपरिक वेशभूषा, नृत्य और तीर-कमान ने खींचा ध्यान, प्रतिनिधियों ने कहा—आजादी के दशकों बाद भी अधिकारों से वंचित आदिवासी
मूकनायक /फ्रीलांसर आकाश घरडे
बालाघाट/ मध्य प्रदेश
बालाघाट। आदिवासी बाहुल्य बालाघाट जिले में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस पर आदिवासी संस्कृति, परंपरा और अधिकारों की आवाज एक साथ देखने को मिली। इस अवसर पर गोंगो पूजन के बाद आदिवासी समाज द्वारा शहर में अधिकार रैली निकाली गई। पारंपरिक वेशभूषा में शामिल महिला-पुरुषों और युवाओं ने अपनी समृद्ध संस्कृति की झलक प्रस्तुत की। रैली में आदिवासी नृत्य और पारंपरिक परिधानों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया, वहीं युवाओं ने पारंपरिक तीर-कमान का प्रदर्शन भी किया।
वीरांगना रानी दुर्गावती भवन से निकली अधिकार रैली
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर वीरांगना रानी दुर्गावती सामुदायिक भवन से अधिकार रैली प्रारंभ हुई। रैली शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए उत्कृष्ट विद्यालय सभागार पहुंची, जहां मंचीय कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे।
संस्कृति के संरक्षण के साथ अधिकारों की भी उठी आवाज
विश्व आदिवासी दिवस संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के अनुरूप प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य दुनिया के आदिवासी समुदायों की विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं, पहचान और अधिकारों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
आदिवासी प्रतिनिधियों ने कहा कि जिले में समाज द्वारा विश्व आदिवासी दिवस को लंबे समय से पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है। यह दिन अपनी संस्कृति और पहचान पर गर्व करने का अवसर है, लेकिन इसके साथ ही समाज की समस्याओं और अधिकारों को लेकर चिंता भी बनी हुई है।
योजनाएं कागजों पर ज्यादा, धरातल पर कम होने का आरोप
प्रतिनिधियों का कहना है कि आजादी के दशकों बाद भी प्रदेश और जिले के आदिवासी समाज का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं और विकास के अवसरों से अपेक्षित रूप से नहीं जुड़ पाया है। आदिवासियों के उत्थान और विकास के लिए सरकारों द्वारा अनेक योजनाएं संचालित की जाती हैं, लेकिन इनका लाभ जमीनी स्तर पर अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की आवश्यकता है। समाज के प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि कई योजनाओं का असर कागजों पर अधिक और धरातल पर कम दिखाई देता है।
अत्याचार और जल-जंगल-जमीन को लेकर नाराजगी
विश्व आदिवासी दिवस पर जहां समाज में उत्साह और अपनी संस्कृति को लेकर गौरव दिखाई दिया, वहीं आदिवासी प्रतिनिधियों ने अपनी नाराजगी भी जाहिर की। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज आज भी अपने अधिकारों और सम्मान से जुड़े कई सवालों को लेकर संघर्ष कर रहा है।
प्रतिनिधियों ने आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करने की मांग उठाई। उनका कहना था कि आदिवासी क्षेत्रों की वन एवं खनिज संपदा के संबंध में स्थानीय समुदायों के हितों और अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। विकास के नाम पर होने वाली गतिविधियों में आदिवासी समाज की सहमति और हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
अधिकारों के साथ विकास की मांग
विश्व आदिवासी दिवस का संदेश केवल उत्सव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आदिवासी समाज ने शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग भी उठाई। समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि आदिवासी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखते हुए विकास की मुख्यधारा में समान अवसर मिलना ही वास्तविक सशक्तिकरण होगा।

