Tuesday, September 29, 2026
Homeमध्यप्रदेशभव्यता एवं अकीदत के साथ संपन्न हुआ आला हजरत का 108वां सालाना...

भव्यता एवं अकीदत के साथ संपन्न हुआ आला हजरत का 108वां सालाना उर्स

कुल की फातिया में अमन-चैन और खुशहाली की दुआ, तीन दिनों तक मस्जिदों में गूंजा इबादत और भाईचारे का पैगाम
मूकनायक समाचार -/ सत्यशील गोंडाने -/ बालाघाट ( मध्यप्रदेश)
बालाघाट। पूरी दुनिया को इस्लाम धर्म की मूल विचारधारा सूफीवाद, अमन, इंसानियत और भाईचारे का संदेश देने वाले विश्व प्रसिद्ध धर्मगुरु एवं महान सूफी संत इमाम अहमद रजा खान आला हजरत का 108वां सालाना उर्स बालाघाट में पूरी अकीदत, उत्साह और गरिमामय वातावरण में भव्यता के साथ संपन्न हुआ। तीन दिवसीय उर्स के दौरान शहर की विभिन्न मस्जिदों में धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। उर्स के अंतिम दिन कुल की विशेष फातिया के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ और देश-दुनिया में अमन-चैन, खुशहाली, भाईचारे तथा तरक्की के लिए विशेष दुआ की गई।

उर्स को लेकर मुस्लिम समाज में खासा उत्साह देखने को मिला। बालाघाट जामा मस्जिद सहित शहर की अन्य मस्जिदों और मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में अकीदतमंदों ने बड़ी संख्या में पहुंचकर धार्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। इस दौरान कुरानखानी, मिलादखानी, दरूद की महफिल, तकरीर और लंगर सहित विभिन्न आयोजन हुए। मस्जिदों में आला हजरत की जिंदगी, उनके धार्मिक ज्ञान, सामाजिक योगदान और इंसानियत के लिए दिए गए संदेशों पर तकरीर की गई।

परचम कुशाई के साथ शुरू हुआ था उर्स

अहले सुन्नत के मुख्यालय बरेली शरीफ से उर्स की तारीख के ऐलान के बाद 6 अगस्त से उर्स के कार्यक्रमों की शुरुआत की गई थी। भारत के ग्रैंड मुफ्ती असजद रजा खान कादरी द्वारा परचम कुशाई के साथ उर्स कार्यक्रमों का आगाज किया गया। इसके बाद तीन दिनों तक देश के विभिन्न हिस्सों के साथ बालाघाट में भी धार्मिक आयोजन हुए।

बालाघाट में जामा मस्जिद सहित अन्य मस्जिदों में अकीदतमंदों ने इबादत की। उर्स के दौरान आयोजित कार्यक्रमों में लोगों ने धार्मिक शिक्षा और आला हजरत की विचारधारा को सुना तथा उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।

कुल की फातिया में उठे अमन-चैन के लिए हाथ

उर्स के अंतिम दिन कुल की विशेष फातिया का आयोजन किया गया। निर्धारित समय पर बड़ी संख्या में अकीदतमंदों की मौजूदगी में फातिया पढ़ी गई। इसके बाद विशेष दुआ कर देश में अमन-चैन, सामाजिक सौहार्द, भाईचारे और खुशहाली की कामना की गई।

इस अवसर पर आयोजित लंगर में भी बड़ी संख्या में लोगों ने सहभागिता की। पूरे कार्यक्रम के दौरान धार्मिक अनुशासन और गरिमा बनी रही। अकीदतमंदों ने आला हजरत की शिक्षाओं को याद करते हुए समाज में प्रेम, भाईचारा और इंसानियत को मजबूत करने का संदेश दिया।

हाजी शोएब खान ने बताया आला हजरत का योगदान

रजा एक्शन कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष हाजी शोएब खान ने बताया कि आला हजरत इमाम अहमद रजा खान का जन्म वर्ष 1856 में बरेली शरीफ में हुआ था। उनका जीवन ऐसे समय में गुजरा, जब देश अंग्रेजी शासन के अधीन था और भारत की आजादी की लड़ाई चल रही थी।

उन्होंने कहा कि उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत अपनी नीतियों के माध्यम से विभिन्न कौमों के बीच मतभेद पैदा कर उन्हें कमजोर करने का प्रयास कर रही थी। ऐसे समय में आला हजरत ने अपने इल्म और शिक्षा के माध्यम से लोगों को धार्मिक ज्ञान प्रदान किया तथा इस्लाम की शिक्षाओं और इंसानियत के संदेश को सामने रखा।

हाजी शोएब खान के अनुसार, आला हजरत ने अपना पूरा जीवन ज्ञान, धर्म और समाज के मार्गदर्शन में लगाया। उन्होंने धार्मिक विषयों पर विस्तृत लेखन किया और लोगों को सही धार्मिक शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास किया।

1300 से अधिक धार्मिक पुस्तकों का उल्लेख

आला हजरत के धार्मिक साहित्य का दायरा बेहद व्यापक रहा है। उनके नाम से लगभग 1300 से अधिक किताबों का उल्लेख किया जाता है। इनमें हुस्सामुलहरमैन, वसाया शरीफ, अल-दौलतुल मककीय्या और फतावा रजविया जैसी महत्वपूर्ण रचनाएं शामिल हैं।

इसके साथ ही कुरआन का उर्दू अनुवाद ‘कंजुल ईमान’ भी उनके प्रमुख धार्मिक कार्यों में माना जाता है। उनके अनुयायियों के अनुसार इन रचनाओं के माध्यम से उन्होंने धार्मिक ज्ञान और इस्लाम की शिक्षाओं को आम लोगों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

धर्म के साथ इंसानियत और शांति पर जोर

उर्स के दौरान आयोजित तकरीरों में वक्ताओं ने कहा कि आला हजरत की शिक्षाओं को केवल धार्मिक दायरे तक सीमित नहीं किया जा सकता। उनकी विचारधारा में अमन, इंसानियत, सामाजिक जिम्मेदारी और जरूरतमंदों की मदद का संदेश भी महत्वपूर्ण है।

वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में समाज को नफरत, भेदभाव और आपसी विवादों से दूर रहकर शिक्षा, एकता और भाईचारे की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है। समाज में शांति और सद्भाव बनाए रखना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।

जमात रजा-ए-मुस्तफा के गठन का भी किया गया उल्लेख

हाजी शोएब खान ने बताया कि आला हजरत ने 17 दिसंबर 1920 को जमात रजा-ए-मुस्तफा नाम से संगठन के गठन की पहल की थी। इसका उद्देश्य समाज को विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ाना और सामाजिक स्तर पर लोगों को संगठित करना था।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी समाज को शिक्षा, संगठन और सामाजिक प्रगति की दिशा में काम करने की जरूरत है। आला हजरत की शिक्षाओं से प्रेरणा लेकर समाज के लोगों को सकारात्मक कार्यों से जुड़ना चाहिए तथा जरूरतमंद और कमजोर वर्गों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए।

मस्जिदों में गूंजा इबादत और भाईचारे का संदेश

तीन दिवसीय उर्स के दौरान बालाघाट शहर की मस्जिदों में धार्मिक माहौल बना रहा। कुरानखानी, मिलादखानी और दरूद की महफिलों में बड़ी संख्या में लोगों ने सहभागिता की। तकरीरों के माध्यम से आला हजरत की जीवनी और उनके धार्मिक योगदान की जानकारी दी गई।

उर्स के अंतिम दिन कुल की फातिया के बाद सामूहिक दुआ में देश की खुशहाली और शांति की कामना की गई। आयोजन में शामिल लोगों ने कहा कि ऐसे धार्मिक आयोजन समाज को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने के साथ ही आपसी भाईचारे को मजबूत करने का काम करते हैं।

आस्था के साथ सामाजिक एकता का संदेश

आला हजरत के 108वें सालाना उर्स का समापन केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे के संदेश के साथ हुआ। उर्स के दौरान लोगों ने आला हजरत की शिक्षाओं को याद किया और समाज में अमन, इंसानियत तथा सद्भाव कायम रखने का संदेश दिया।

आयोजन समिति एवं रजा एक्शन कमेटी से जुड़े पदाधिकारियों ने उर्स में सहयोग करने वाले सभी लोगों, मस्जिदों के जिम्मेदारों, अकीदतमंदों और कार्यक्रम में शामिल हुए समाजजनों का आभार व्यक्त किया।

इस प्रकार तीन दिनों तक चले आला हजरत के 108वें सालाना उर्स का समापन कुल की फातिया और विशेष दुआ के साथ पूरी भव्यता, अकीदत, उत्साह एवं गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। उर्स से पूरे बालाघाट में अमन, भाईचारे और इंसानियत का पैगाम दिया गया।

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments