Tuesday, September 29, 2026
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जड़ से कटे पत्तों का क्या हश्र होता है ?

लेखक – डब्लू पी आदवंशी

आज डॉ. रामदयाल मुंडा जी की जयंती है। पूरा आदिवासी समाज उन्हें याद कर रहा है। पर इस याद के बीच एक कड़वा सच भी आइने की तरह सामने खड़ा है, जिसे देखे बिना यह जयंती एक कर्मकांड बनकर रह जाएगी।

सच यह है कि जिस समाज के लिए मुंडा जी ने शिकागो से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक अपनी बोली लगाई, आज उसी समाज का एक हिस्सा अपने ही पुरखों के ‘आद-धर्म’ को पिछड़ेपन का लेबल लगाकर उससे भाग रहा है।

यह भागना धर्म परिवर्तन नहीं है, यह आत्म-परिवर्तन है, और आत्मा से भागा हुआ आदमी जिंदा लाश से ज्यादा कुछ नहीं होता।

ओढ़ा हुआ धर्म, उधार का गौरव

मैं सीधे सवाल पूछता हूँ –

तुम्हारे बाप-दादा ने किस चर्च, किस मस्जिद, किस मंदिर में जाकर पहाड़ की पूजा सीखी थी? तुम्हारी माँ ने किस किताब को पढ़कर सरई के पत्ते में चावल लपेटना सीखा था? तुम्हारे पुरखे ने किस पादरी, किस मौलवी से पूछकर करम और सरहुल मनाया था?

नहीं। तुम्हारा धर्म किसी किताब से नहीं आया। तुम्हारा धर्म जमीन से उगा है। पेड़, पहाड़, नदी, हवा – यही तुम्हारे वेद हैं, यही तुम्हारी कुरान, यही तुम्हारी बाइबल।

और आज तुम उसी को छोड़कर दूसरों के दरवाजे पर कटोरा लेकर खड़े हो कि “हमें भी अपने में गिन लो।”

डॉ. रामदयाल मुंडा ने कहा था – हम हिन्दू नहीं, मुसलमान नहीं, ईसाई नहीं, हम आदिवासी हैं। यह नारा नफरत का नहीं था, यह पहचान का उद्घोष था। पर आज कुछ लोगों को यह पहचान बोझ लगती है। उन्हें लगता है – आदिवासी लिखने से नौकरी नहीं मिलेगी, सरना लिखने से लोग हँसेंगे।

तो सुनो, हँसेगा तो वही समाज जिसकी थाली में तुम जूठन बनकर बैठे हो। कोई भी धर्म अपने उधार के अनुयायियों को कभी अपना सिरमौर नहीं बनाता। तुम वहाँ भी दूसरी कतार में ही खड़े मिलोगे।

दलाल कौन है ? बाहर वाला या घर का विभीषण?

अंग्रेजों के समय में बाहर से मिशनरी आते थे। आज बाहर से आने की जरूरत नहीं। हमारे ही बीच के कुछ पढ़े-लिखे, नौकरीशुदा, मंच-मोह वाले लोग अपने ही समाज को समझा रहे हैं कि “आद-धर्म जैसी कोई चीज नहीं होती।”

मैं पूछता हूँ – अगर आद-धर्म नहीं है, तो तुम्हारे घर में पाट पूजा कौन करता है ? तुम्हारे गांव में पहान कौन है? तुम्हारे मसान में दिया कौन जलाता है ?

तुम्हें शर्म आती है यह कहने में कि हम प्रकृति पूजक हैं। और तुम्हें गर्व होता है यह कहने में कि हम अमुक धर्म के हैं, जिस धर्म के लोगों ने आज तक तुम्हारी भाषा के लिए एक स्कूल तक नहीं खोला।

यह धर्म नहीं, यह मानसिक गुलामी है। और गुलाम का कोई धर्म नहीं होता, उसका केवल मालिक होता है।

डॉ. मुंडा को पद्मश्री इसलिए नहीं मिला था कि उन्होंने आदिवासियों को किसी और धर्म में जाने की वकालत की। उन्हें पद्मश्री इसलिए मिला था क्योंकि उन्होंने दुनिया को बताया कि आदिवासियों का अपना धर्म है, जो सबसे पुराना है – आदि-धर्म।

अब फैसला तुम्हारा है

जनगणना आ रही है। सरकार पूछेगी – तुम्हारा धर्म क्या है?

उस दिन तुम्हारा एक टिक तुम्हारी आने वाली सात पीढ़ियों का भविष्य तय करेगा। अगर तुमने डरकर, लालच में, या शर्म से अपना धर्म छुपा लिया और दूसरे के कॉलम में जा घुसे, तो याद रखना – तुम्हारे बच्चे तुम्हें माफ नहीं करेंगे। इतिहास तुम्हें माफ नहीं करेगा। क्योंकि तुमने जनसंख्या नहीं, अपनी आत्मा का आंकड़ा घटा दिया।

जो कौम अपना धर्म-कोड नहीं बचा सकती, वो अपनी जमीन का पट्टा क्या बचाएगी?

डॉ. रामदयाल मुंडा का आह्वान किसी पार्टी का नहीं, पूरे आदवंशी/आदिवासी अस्तित्व का आह्वान है। जड़ से जुड़े रहोगे तो तूफान में भी खड़े रहोगे। जड़ से कटे तो खाद बनने के सिवा तुम्हारी कोई औकात नहीं।

तय कर लो – तुम्हें खाद बनना है या पेड़ ?

  • डब्लू पी आदवंशी
    लेखक आदवंशी चिंतक एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
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