Tuesday, September 29, 2026
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अंगूठा नहीं, अब पूरा स्कूल ही छीना जा रहा है

आद धर्म की दृष्टि में आज की शिक्षा व्यवस्था
“जरूरी नहीं है कि एकलव्य का अंगूठा ही काटा जाय, शिक्षा को महंगा करके व स्कूल बंद करके भी तो एकलव्य को शिक्षा से वंचित किया जा सकता है। आज यही हो रहा है।”
त्रेता में गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से अंगूठा मांग कर उसकी विद्या रोक दी थी। आज द्रोणाचार्य को मांगने की जरूरत नहीं पड़ती। आज की व्यवस्था ने एक नया तरीका खोज लिया है – शिक्षा को इतना महंगा कर दो और सरकारी स्कूलों को बंद कर दो कि एकलव्य खुद ही पढ़ाई छोड़ दे।

आद धर्म के प्रवर्तक बाबू मंगूराम मुगोवालिया जी ने इस षड्यंत्र को सौ साल पहले ही समझ लिया था। इसलिए जब उन्होंने 1926 में आद धर्म की नींव रखी तो उसकी शुरुआत मंदिर से नहीं, ‘आद धर्म स्कूल’ से की। उन्होंने अपने गांव मुगोवाल में सबसे पहले दलित बच्चों के लिए स्कूल खोला। क्योंकि वे जानते थे – बिना शिक्षा के मूलनिवासी कभी अपने हक के लिए खड़ा नहीं हो सकता।

आद धर्म, गुरु रविदास, गुरु वाल्मीकि, संत कबीर और नामदेव की शिक्षाओं पर आधारित है। गुरु रविदास जी का बेगमपुरा का संकल्प था – ऐसा राज जहाँ सबको समान हक मिले। उस समान हक में सबसे पहला हक है – ज्ञान का हक।

पर आज क्या हो रहा है?

  1. शिक्षा को बाजार बना दिया गया है: प्राइवेट स्कूलों की लाखों की फीस, प्राइवेट यूनिवर्सिटी का जाल। एक मजदूर, एक सफाई सेवक, एक खेतिहर मजदूर का बच्चा यह फीस कहां से लाएगा? उसका अंगूठा तो एडमिशन फॉर्म पर ही कट जाता है।
  2. सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं: कम गिनती और मर्जर के नाम पर गांव-गांव के स्कूल बंद हो रहे हैं। पंजाब में भी हम यह देख रहे हैं। गांव का स्कूल बंद होने का मतलब है – हमारी बेटियों की शिक्षा बंद, हमारे एकलव्य बच्चों का भविष्य बंद। यह अनपढ़ रखने की आधुनिक योजना है।

आद धर्म कहता है – हम अछूत नहीं, हम इस देश के आदि निवासी हैं, मूलनिवासी हैं। और मूलनिवासी को शिक्षा की भीख नहीं, शिक्षा पर अधिकार चाहिए।

1931 में जब हमें कोई नहीं गिनता था, तब 5 लाख लोगों ने सीना ठोक कर जनगणना में लिखवाया था – हम आद-धर्मी हैं। वह जागृति शिक्षा से ही आई थी। आज फिर उसी जागृति की जरूरत है।

आदवंशी फाउंडेशन भारत की मांग है:

गांव-देहात का एक भी सरकारी स्कूल बंद न किया जाए, बल्कि बाबू मंगूराम के आद धर्म स्कूल की तरह हर स्कूल को मजबूत किया जाए।
शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में पूरी तरह मुफ्त और समान किया जाए।
पाठ्यक्रम में हमारे गुरुओं – गुरु रविदास, गुरु वाल्मीकि, संत कबीर की बाणी को अनिवार्य किया जाए ताकि हर बच्चे को पता चले कि वह किसी का दास नहीं, इस धरती का मालिक है।

एकलव्य ने अंगूठा देकर भी विद्या नहीं छोड़ी थी। आज का एकलव्य अंगूठा भी नहीं देगा और अपना स्कूल भी नहीं छोड़ेगा।

जय गुरुदेव, जय वाल्मीकि, जय आद धर्म, जय मूलनिवासी।


लेखक:
डब्लू पी आदवंशी
संयोजक, आदवंशी फाउंडेशन (भारत)
लुधियाना, पंजाब

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