Thursday, July 16, 2026
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स्वयं को शारीरिक कष्ट देना तप नहीं है, बल्कि अपने आलस्य, स्वार्थ और कमियों पर जीत हासिल करना ही है असली तप

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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​प्रकृति भी हमें संदेश देती है कि निखरने के लिए तपना आवश्यक है। स्वर्ण अग्नि में तपकर कुंदन बनता है, हीरा घिसाई के बाद चमकता है और बीज धरती का अंधकार चीरकर वृक्ष का रूप लेता है। इसी प्रकार मनुष्य का व्यक्तित्व भी विपरीत परिस्थितियों, कठिन परिश्रम और आत्मसंयम की अग्नि में तपकर तेजस्वी बनता है। जो व्यक्ति चुनौतियों से घबराकर पीछे हट जाता है, वह अपनी संभावनाओं को खो देता है, जबकि साहसी व्यक्ति हर कठिनाई को सफलता की सीढ़ी बना लेता है। अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण, समय का सदुपयोग, संयमित जीवन, सतत अध्ययन, सेवा और सत्य के लिए संघर्ष, यही आधुनिक तप है।
​ जब मनुष्य अपने व्यक्तिगत सुखों से ऊपर उठकर समाज और मानवता के हित में कार्य करता है, तब उसका जीवन सार्थक बनता है। तपस्या का वास्तविक फल केवल सफलता नहीं, बल्कि आत्मबल, चरित्र, विवेक और आंतरिक तेज की प्राप्ति है। यही तेज उसे जीवन की सर्वोच्च ऊंचाईयों पर ले जाता है।स्वयं को शारीरिक कष्ट देना तप नहीं है, बल्कि अपने आलस्य, स्वार्थ और कमियों पर जीत हासिल करना ही असली तप है। क्रोध, लोभ, और अहंकार जैसी कमियों को धीरे-धीरे अपने भीतर से समाप्त करना ही वह अग्नि है, जो मनुष्य को सोने की तरह चमका देती है। संक्षेप में कहें तो, शारीरिक प्रदर्शन मात्र से कोई तपस्वी नहीं बनता बल्कि अपने मन को जो जीत लेता है, वही सच्चा विजेता और तपस्वी है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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