Tuesday, September 29, 2026
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जिसका मन जितना निर्मल और अहंकार मुक्त होता है, उसकी रचनात्मकता और क्षमता उतनी ही निखर कर आती है सामने

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मानव मन एक दर्पण की भांति है। जब तक दर्पण पर धूल जमा रहती है, तब तक उसमें कोई भी प्रतिबिंब स्पष्ट दिखाई नहीं देता। इसी प्रकार, जब मनुष्य के मन में ईर्ष्या, द्वेष और अहंकार रूपी धूल जम जाती है, तो उसकी वास्तविक प्रतिभा और क्षमताएं दब जाती हैं। इसके विपरीत, जिसका मन जितना निर्मल और अहंकार-मुक्त होता है, उसकी रचनात्मकता और कार्यक्षमता उतनी ही निखर कर सामने आती है। रचनात्मकता का सीधा संबंध नया सोचने, नया सीखने और लीक से हटकर कुछ करने से है। जब मनुष्य का मन अहंकार से भरा होता है, तो वह यह मानने लगता है कि वह सब जानता है। अहंकार व्यक्ति के सोचने की सीमाओं को बांध देता है और उसमें नया सीखने की ललक को खत्म कर देता है।
इतिहास गवाह है कि दुनिया के महान वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार और विचारक—चाहे वे महात्मा बुद्ध हों, स्वामी विवेकानंद हों या डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम—सबकी महानता का आधार उनका निर्मल स्वभाव और अहंकार-रहित व्यक्तित्व ही था। उनकी रचनात्मकता इसीलिए अमूल्य बन सकी क्योंकि उसमें स्वार्थ और अहंकार का तिनका भी नहीं था । संक्षेप में कहें तो निर्मल मन और निरहंकारी स्वभाव कोई साधारण गुण नहीं हैं, बल्कि यह व्यक्ति की क्षमता और रचनात्मकता को जगाने की चाबी हैं। जब हम अपने मन से ‘मैं’ और ‘मेरा’ का अहंकार हटा देते हैं, तो हमारा मस्तिष्क नए विचारों के लिए पूरी तरह खुल जाता है। यदि हम अपनी वास्तविक क्षमता का पूर्ण विकास करना चाहते हैं, तो हमें सबसे पहले अपने मन को स्वच्छ और स्वभाव को विनम्र बनाना होगा।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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