मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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अक्सर समाज और रिश्तों का ताना-बाना बहुत हद तक उम्मीदों और अपेक्षाओं पर टिका होता है, लेकिन इस व्यवस्था का एक कड़वा सच यह भी है कि कई बार किसी की अपेक्षाओं पर खरा ना उतरने मात्र से, बिना किसी वास्तविक गलती के भी, इंसान को ‘गलत’ या ‘बुरा’ मान लिया जाता है। यह स्थिति मानसिक और भावनात्मक रूप से काफी पीड़ादायक होती है। इंसान स्वभाव से ही अपने आसपास के लोगों से कुछ उम्मीदें बांध लेता है। जब ये उम्मीदें किसी व्यक्ति के सामर्थ्य, इच्छा या प्राथमिकताओं से मेल नहीं खातीं, तो टकराव पैदा होता है।
यहां यह समझना बेहद जरूरी है कि आप हर किसी को खुश नहीं रख सकते। यदि आपकी नीयत साफ है, तो दूसरों के प्रमाणपत्र की बैसाखी छोड़ देना ही बेहतर है। हर व्यक्ति के अपने सपने, जिम्मेदारियां और मानसिक स्थिति होती है। जब लोग आपकी स्थिति को समझे बिना केवल अपनी जरूरतों को प्राथमिकता देते हैं, तो आपकी जायज मजबूरियां भी उन्हें आपकी ‘गलती’ नजर आती हैं । रिश्तों में अपेक्षाओं का होना अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन उन्हें शर्तों और फैसलों में बदल देना गलत है। यदि किसी की अनुचित अपेक्षा पूरी न करने पर आपको ‘बुरा’ समझा जा रहा है, तो यह आपकी चरित्र की कमी नहीं, बल्कि सामने वाले के नजरिए की सीमा है। अपनी भलाई और मानसिक शांति के लिए, दूसरों की अपेक्षाओं के इस अनावश्यक बोझ को उतार फेंकना ही समझदारी है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

