

मूकनायक समाचार | सत्यशील गोंडाने | रामपायली / बालाघाट
रामपायली नगर एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में 61 हिजरी (680 ईस्वी) की ऐतिहासिक करबला की घटना की स्मृति में मुहर्रम का पर्व श्रद्धा, अनुशासन एवं आपसी भाईचारे के वातावरण में मनाया गया। इस अवसर पर इमाम हुसैन एवं उनके 72 साथियों की शहादत को श्रद्धापूर्वक याद करते हुए ताजिया जुलूस निकाले गए। मुस्लिम समाज के साथ अन्य समुदायों के लोगों ने भी जुलूस का स्वागत कर सामाजिक सौहार्द एवं गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल प्रस्तुत की।
इतिहास के अनुसार 10 मुहर्रम, 61 हिजरी (10 अक्टूबर 680 ईस्वी) को वर्तमान इराक के करबला मैदान में पैगंबर हजरत मुहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने अन्याय, अत्याचार और असत्य के विरुद्ध संघर्ष करते हुए अपने परिवार एवं साथियों सहित सर्वोच्च बलिदान दिया था। उनकी शहादत आज भी सत्य, न्याय, मानवता और इंसाफ के लिए संघर्ष की अमर प्रेरणा मानी जाती है।
रामपायली में सुबह से ही इमामबाड़ों में कुरआनखानी, फातिहा एवं मजलिस का आयोजन किया गया। इसके पश्चात आकर्षक ताजियों को नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए करबला मैदान तक ले जाया गया, जहां धार्मिक परंपराओं के अनुसार उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
जुलूस के दौरान “या हुसैन” की सदाएं गूंजती रहीं तथा मातमी धुनों के बीच अकीदतमंदों ने इमाम हुसैन की कुर्बानी को याद किया। विभिन्न स्थानों पर सामाजिक संगठनों द्वारा शरबत, पेयजल एवं अन्य सेवा शिविर लगाए गए। पूरे आयोजन में सभी धर्मों के लोगों ने सहभागिता निभाकर अमन, शांति और भाईचारे का संदेश दिया।
शांतिपूर्ण आयोजन सुनिश्चित करने के लिए पुलिस एवं प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद रहा। संवेदनशील क्षेत्रों में पर्याप्त पुलिस बल तैनात किया गया तथा संपूर्ण जुलूस शांतिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ।
मुहर्रम का यह आयोजन केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, सत्य के प्रति अडिग रहने तथा मानवता की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देने की प्रेरणा का भी संदेश देता है। 61 हिजरी (680 ईस्वी) की करबला की शहादत आज भी पूरी दुनिया के लिए साहस, त्याग और इंसानियत की अमर मिसाल बनी हुई है।
इस आयोजन को सफल बनाने में मो. रहीम भाई, हारून अली, यासीन भाई, जावेद भाई, सम्राट अशोक बुद्ध विहार के सचिव सत्यशील गोंडाने, आनंद मेश्राम, वरिष्ठ पत्रकार जगदीश देडे सहित ग्राम के गणमान्य नागरिकों एवं वरिष्ठजनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

