परीक्षा में कथित अनियमितता से लेकर जातीय भेदभाव के आरोपों तक कई सवाल अनुत्तरित, दोषी कौन है, यह जांच तय करेगी, लेकिन संस्थागत जवाबदेही की परीक्षा शुरू हो चुकी है
प्रवीण बागड़े
नागपुर
मो.क्र. ९९२३६२०९१९
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साहिल रवींद्र वाकोड़े, 20 वर्षीय आयआयटी बॉम्बे के छात्र की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। इस घटना ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था, शैक्षणिक दबाव, संस्थागत जवाबदेही, जातीय भेदभाव और संकट में फंसे विद्यार्थियों के प्रति शिक्षण संस्थानों के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। साहिल आयआयटी बॉम्बे में एनर्जी साइंस एंड इंजिनियरिंग के द्वितीय वर्ष के बी.टेक छात्र थे। सितंबर 2026 में परीक्षा से जुड़े एक घटनाक्रम के बाद उनकी आत्महत्या से मृत्यु हुई। आयआयटी बॉम्बे के अनुसार, साहिल ने मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर परीक्षा का प्रश्नपत्र ChatGPT पर अपलोड किया था। संस्थान का कहना था कि उसके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी और संबंधित शिक्षक तथा विभागाध्यक्ष ने उससे बातचीत कर यह आश्वासन दिया था कि इस घटना का उसके शैक्षणिक भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर, साहिल के परिवार ने जातीय भेदभाव और संस्थागत उत्पीड़न के आरोप लगाए। परिवार की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित प्रावधानों और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया। इन आरोपों की जांच अभी जारी है और किसी व्यक्ति की कानूनी जिम्मेदारी अभी न्यायिक रूप से स्थापित नहीं हुई है। यह अंतर समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जांच का उद्देश्य पहले से तय निष्कर्ष को सही साबित करना नहीं, बल्कि सच्चाई तक पहुंचना होना चाहिए।
परीक्षा की शुचिता और नियमों का पालन निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। यदि कोई विद्यार्थी परीक्षा नियमों का उल्लंघन करता है, तो संस्थान को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई करने का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों हैं। लेकिन हर अनुशासनात्मक व्यवस्था को यह भी समझना होगा कि विद्यार्थी केवल उसकी परीक्षा की उत्तरपुस्तिका या अंकतालिका नहीं है।परीक्षा की गलती सुधारी जा सकती है। असफल परीक्षा दोबारा दी जा सकती है। शैक्षणिक असफलता से उबरा जा सकता है।लेकिन इंसान की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती। इसलिए प्रत्येक शिक्षण संस्थान को खुद से यह सवाल पूछना होगा। जब कोई विद्यार्थी गलती करता है, तो क्या व्यवस्था केवल दंड देती है या उसे समझने, संभालने और सुधारने का अवसर भी देती है ?अनुशासन और संवेदनशीलता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। वास्तव में सच्ची शिक्षा व्यवस्था वही है जो दोनों के बीच संतुलन बना सके।
साहिल मामले का सबसे गंभीर पहलू जातीय भेदभाव का आरोप है। परिवार का कहना है कि साहिल ने जातीय उत्पीड़न की बात कही थी। दूसरी ओर आयआयटी बॉम्बे का कहना है कि उसके SC/ST सेल या प्रशासन के पास ऐसी कोई औपचारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई थी। इनमें से किसी एक पक्ष के कथन को अपने आप अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा। किसी विद्यार्थी द्वारा औपचारिक शिकायत न करना अपने आप में भेदभाव होने का प्रमाण नहीं है। लेकिन शिकायत न होने मात्र से भेदभाव की संभावना को भी निर्णायक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता।इसीलिए आवश्यक है, स्वतंत्र, पारदर्शी और प्रमाण-आधारित जांच। शिक्षण संस्थान ऐसे स्थान होने चाहिए जहां विद्यार्थी की जाति, धर्म, भाषा, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पृष्ठभूमि उसके साथ होने वाले व्यवहार को प्रभावित न करे। यदि भेदभाव सिद्ध होता है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो यह निष्कर्ष भी निष्पक्ष जांच के माध्यम से ही सामने आना चाहिए।
साहिल की घटना के संदर्भ में ‘द्रोणाचार्य’ की उपमा सार्वजनिक चर्चा में सामने आई है। इसके पीछे द्रोणाचार्य और एकलव्य की ऐतिहासिक कथा तथा जाति, विशेषाधिकार और शिक्षा तक पहुंच से जुड़े प्रश्न हैं। लेकिन किसी भी प्रोफेसर को जांच पूरी होने से पहले ऐतिहासिक उपमा के आधार पर दोषी घोषित करना उचित नहीं है। असल सवाल यह नहीं है कि किसे ‘द्रोणाचार्य’ कहा जाए। असल सवाल है की, क्या आधुनिक शिक्षा व्यवस्था ने उन सामाजिक ऊंच-नीच की मानसिकताओं से वास्तव में मुक्ति पा ली है, जिन्होंने इतिहास में समान शैक्षणिक अवसरों से अनेक लोगों को वंचित किया? यदि कोई विद्यार्थी स्वयं को अकेला, अपमानित या भेदभाव का शिकार महसूस करता है, तो संस्थान में ऐसा सुरक्षित तंत्र होना चाहिए जहां वह बिना भय अपनी बात रख सके।
साहिल की मृत्यु के बाद आयआयटी बॉम्बे के विद्यार्थियों ने स्वतंत्र जांच, बेहतर छात्र कल्याण व्यवस्था और मानसिक स्वास्थ्य सहायता सहित अनेक मांगें उठाईं। आंदोलन के बाद संस्थान ने 18 सूत्रीय मांगपत्र स्वीकार किया। इसे केवल विद्यार्थियों और प्रशासन के बीच संघर्ष के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह संस्थागत विश्वास में पैदा हुई दरार का संकेत भी है। जब विद्यार्थियों को लगता है कि सामान्य संस्थागत माध्यमों से उनकी आवाज नहीं सुनी जाएगी, तो आंदोलन उनकी भाषा बन जाता है।समाधान आंदोलन को दबाना नहीं, बल्कि ऐसे मजबूत संस्थागत तंत्र तैयार करना है जिनके कारण विद्यार्थियों को अपनी बात कहने के लिए अंतिम सीमा तक न जाना पड़े।
मीडिया में उद्धृत एक संकलन के अनुसार, 2006 से सितंबर 2026 के बीच विभिन्न आयआयटी में 170 से अधिक विद्यार्थियों की आत्महत्या या अन्य असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु दर्ज की गई है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह केंद्र सरकार का आधिकारिक केंद्रीकृत डेटाबेस नहीं है, यह सूचना के अधिकार की प्रतिक्रियाओं और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित एक संकलन है।इस सीमा के बावजूद व्यापक समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों की सफलता केवल प्लेसमेंट, रैंकिंग, शोधपत्र और परीक्षा परिणामों से नहीं मापी जानी चाहिए। किसी संस्थान की असली सफलता यह भी है कि उसके विद्यार्थी वहां स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और सुना हुआ महसूस करते हैं या नहीं।
साहिल की घटना केवल संवेदना व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इससे ठोस संस्थागत सुधार निकलने चाहिए।
- पहला, साहिल की मृत्यु की परिस्थितियों की जांच स्वतंत्र, पारदर्शी और प्रमाण-आधारित होनी चाहिए।
- दूसरा, विशेषकर वंचित और संवेदनशील पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों के लिए गोपनीय शिकायत और सहायता तंत्र मजबूत किया जाना चाहिए।
- तीसरा, SC/ST सेल और अन्य छात्र सहायता व्यवस्थाएं आसानी से उपलब्ध, संवेदनशील और भरोसेमंद होनी चाहिए।
- चौथा, परीक्षा से संबंधित गंभीर अनुशासनात्मक मामलों में परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए उचित सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए।
- पांचवां, शिक्षकों और प्रशासनिक अधिकारियों को जातीय संवेदनशीलता, भेदभाव, छात्र कल्याण और संकट प्रबंधन का नियमित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
- छठा, प्रत्येक बड़े परिसर में आसानी से उपलब्ध मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और आपातकालीन सहायता व्यवस्था होनी चाहिए।
- सातवां, छात्र कल्याण और शिकायत निवारण की संस्थागत व्यवस्थाओं में विद्यार्थियों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
विद्यार्थी की गलती उसके जीवन से बड़ी नहीं हो सकती याग बात साहिल की त्रासदी शिक्षा व्यवस्था को आईना दिखाती है। परीक्षा के नियम आवश्यक हो सकते हैं। शैक्षणिक ईमानदारी महत्वपूर्ण है। अनुशासन भी जरूरी है। लेकिन मानवीय संवेदना के बिना शिक्षा केवल मूल्यांकन की व्यवस्था बनकर रह जाती है।विश्वविद्यालय केवल इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक या प्रशासक तैयार करने की जगह नहीं है। वह ऐसे इंसान तैयार करने का स्थान भी है जो समानता, गरिमा और संवेदनशीलता को समझें।इसलिए साहिल की मृत्यु के बाद सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि दोषी कौन है। उससे बड़ा सवाल है की, क्या समय रहते व्यवस्था कुछ अलग कर सकती थी? इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर आवश्यक है।
कानूनी जिम्मेदारी जांच तय करेगी। लेकिन सुरक्षित, समावेशी और मानवीय परिसर तैयार करने की जिम्मेदारी जांच पूरी होने तक इंतजार नहीं कर सकती। विद्यार्थी की गलती सुधारी जा सकती है। असफल परीक्षा दोबारा दी जा सकती है। लेकिन खोया हुआ जीवन वापस नहीं लाया जा सकता। इसलिए साहिल की मृत्यु को केवल एक और आंकड़ा नहीं बनने देना चाहिए। यह भारत के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के लिए अनुशासन, भेदभाव, मानसिक स्वास्थ्य, छात्र गरिमा और संस्थागत जवाबदेही को नए सिरे से समझने का अवसर बनना चाहिए।
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