अनीता कश्यप, नारकंडा ब्लॉक हि0प्र0 | सुप्रीम कोर्ट ने सड़कों पर पैदल चलने वाले लोगों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि फुटपाथ पर सुरक्षित रूप से चलना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सड़कों के उपयोग में सबसे पहली प्राथमिकता पैदल यात्रियों को मिलनी चाहिए और उनके लिए सुरक्षित, स्पष्ट तथा अतिक्रमण मुक्त फुटपाथ उपलब्ध कराना सरकार एवं स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है। यह टिप्पणी न्यायालय ने एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें स्कूल जा रहे पांच वर्षीय बच्चे की जान चली गई थी। मामले में अदालत ने मृतक बच्चे के पिता को दिए जाने वाले मुआवजे की राशि बढ़ाकर 11.44 लाख रुपये कर दी।न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदूरकर की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि पैदल चलने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत प्रदत्त आवागमन की स्वतंत्रता का हिस्सा है। साथ ही यह अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है।अदालत ने कहा कि सड़कों का निर्माण केवल वाहनों के लिए नहीं किया जाता, बल्कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि सड़क मौजूद है तो उसके साथ सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिन्हित फुटपाथ भी होना चाहिए, ताकि लोग बिना किसी खतरे के अपने गंतव्य तक पहुंच सकें।सुप्रीम कोर्ट ने शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं तथा पंचायतों को फुटपाथों के निर्माण, रखरखाव और उन्हें अतिक्रमण से मुक्त रखने की जिम्मेदारी याद दिलाई। अदालत ने कहा कि पैदल चलना दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है और इस मूलभूत सुविधा की अनदेखी नहीं की जा सकती। फैसले में यह भी कहा गया कि यदि किसी व्यक्ति के सुरक्षित रूप से फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक और कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है।

