मूकनायक/ आशीष कुमार
हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश में हाल के दिनों में मिड डे मील कर्मियों और आंगनबाड़ी वर्कर्स एवं हेल्पर्स के आंदोलनों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की कल्याणकारी योजनाओं की रीढ़ बने लाखों स्कीम वर्कर्स अब अपने अधिकारों के लिए निर्णायक संघर्ष के रास्ते पर हैं। शिमला में हजारों मिड डे मील कर्मियों का प्रदर्शन और उससे पहले 8 जून को आंगनबाड़ी कर्मियों की राज्यव्यापी हड़ताल केवल अलग-अलग संगठनों के कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि उस व्यापक असंतोष की अभिव्यक्ति थे जो वर्षों से शोषण, उपेक्षा और असुरक्षित रोजगार के खिलाफ पनप रहा है।
आज मिड डे मील कर्मी हों, आंगनबाड़ी वर्कर्स हों या आशा कार्यकर्ता—ये सभी सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। बच्चों के पोषण, प्रारंभिक शिक्षा, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा ग्रामीण समाज तक सरकारी योजनाओं को पहुंचाने का सबसे बड़ा दायित्व इन्हीं महिलाओं के कंधों पर है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन योजनाओं की सफलता का श्रेय सरकारें स्वयं लेती हैं, उन्हीं योजनाओं को चलाने वाली लाखों महिला कर्मियों को कर्मचारी का दर्जा तक नहीं दिया जाता। उन्हें बेहद कम मानदेय पर काम करने के लिए मजबूर रखा जाता है और श्रम कानूनों से मिलने वाले बुनियादी अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है।
शिमला में मिड डे मील कर्मियों के विशाल प्रदर्शन ने इस सच्चाई को पूरे प्रदेश के सामने रखा। वर्षों से मात्र पाँच हजार रुपये मासिक मानदेय पर कार्य कर रही इन कर्मियों के मानदेय में लगभग सत्रह वर्षों से कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा 12 माह का वेतन देने के आदेश के बावजूद सरकार का उसे लागू करने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना यह दर्शाता है कि सरकार मेहनतकश महिलाओं के न्यायोचित अधिकारों को भी सहजता से स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
दूसरी ओर, 8 जून की राज्यव्यापी हड़ताल में आंगनबाड़ी कर्मियों ने सरकारी कर्मचारी का दर्जा, सम्मानजनक वेतन, ग्रेच्युटी, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, पदोन्नति और रिक्त पदों को भरने जैसी मांगों को बुलंद किया। लंबे समय से अतिरिक्त कार्यों का बोझ बढ़ता गया है, लेकिन अधिकार और सुविधाएं लगातार घटती गई हैं। यह स्थिति केवल हिमाचल प्रदेश की नहीं, बल्कि पूरे देश की तस्वीर है।
इन दोनों आंदोलनों की समानता केवल मांगों में नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और राजनीतिक महत्व में भी है। दोनों क्षेत्रों में अधिकांश कर्मी महिलाएं हैं। एक ओर सरकारें महिला सशक्तिकरण और नारी सम्मान के बड़े-बड़े दावे करती हैं, दूसरी ओर इन्हीं महिलाओं के श्रम का सबसे अधिक अवमूल्यन किया जाता है। यह केवल आर्थिक अन्याय नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय भी है।
असल में स्कीम वर्कर्स का यह संघर्ष देश में लागू की जा रही नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के खिलाफ संघर्ष का हिस्सा है। सार्वजनिक सेवाओं को धीरे-धीरे कमजोर कर निजीकरण और ठेकाकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं को भी लागत और मुनाफे के नजरिए से देखा जा रहा है। परिणामस्वरूप स्थायी रोजगार समाप्त किए जा रहे हैं और उनकी जगह कम मानदेय, असुरक्षित तथा अधिकारविहीन रोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है।
मिड डे मील योजना में केंद्रीय किचन, स्कूलों के विलय और ठेकाकरण की नीतियां हों या आंगनबाड़ी सेवाओं में बढ़ता निजीकरण—इनका अंतिम उद्देश्य श्रम लागत कम करना और सार्वजनिक व्यवस्था को कमजोर करना है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब मेहनतकश महिलाओं और उन करोड़ों बच्चों पर पड़ता है, जिनके पोषण और प्रारंभिक शिक्षा की जिम्मेदारी इन्हीं योजनाओं पर निर्भर है।
हिमाचल प्रदेश में इन आंदोलनों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि संगठित संघर्ष ने सरकार को बातचीत के लिए मजबूर किया। यह एक बार फिर साबित करता है कि मजदूर वर्ग की एकता और संगठन ही अधिकारों की सबसे बड़ी ताकत है। हालांकि मजदूर आंदोलन का अनुभव यह भी बताता है कि केवल आश्वासनों से अधिकार नहीं मिलते। अधिकार तभी सुनिश्चित होते हैं जब संघर्ष निरंतर जारी रहे और व्यापक जनसमर्थन उसके साथ खड़ा हो।
आज आवश्यकता है कि स्कीम वर्कर्स के संघर्ष को केवल किसी एक विभाग या एक कर्मचारी वर्ग का आंदोलन न समझा जाए। यह देश के मेहनतकश वर्ग, महिलाओं, बच्चों, सार्वजनिक शिक्षा, पोषण और सामाजिक न्याय की लड़ाई है। मजदूर, किसान, कर्मचारी, युवा और महिला संगठनों को इस संघर्ष के साथ मजबूती से खड़ा होना होगा। क्योंकि यदि आज स्कीम वर्कर्स के अधिकारों पर हमला सफल होता है, तो कल इसका असर पूरे श्रमिक वर्ग पर पड़ेगा।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि मेहनतकश जनता ने अपने अधिकार कभी दया या कृपा से नहीं पाए। हर अधिकार लंबे संघर्षों की देन है। हिमाचल प्रदेश के मिड डे मील कर्मियों और आंगनबाड़ी कर्मियों के हालिया आंदोलन भी उसी गौरवशाली संघर्षशील परंपरा की कड़ी हैं। यह लड़ाई केवल वेतन बढ़ाने की नहीं, बल्कि श्रम की गरिमा, महिलाओं के सम्मान, सार्वजनिक सेवाओं की रक्षा और सामाजिक न्याय की लड़ाई है। इस संघर्ष की सफलता केवल स्कीम वर्कर्स की जीत नहीं होगी, बल्कि पूरे मेहनतकश समाज की जीत होगी।
— आशीष कुमार
राज्य सचिव, सीटू हिमाचल प्रदेश

