परिचय: समझौते की छाया में खोई जातिविहीन मुहिम
डॉ. बी.आर. आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच 1932 को पूना समझौता (Poona Pact) भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक ऐसा मोड़ बन गया जिसने वंचित, उपेक्षित और आदवंशी समुदायों के लिए “पृथक निर्वाचन” और “डबल वोट का अधिकार” को संस्थागत रूप से खत्म कर दिया। इसी तरह लॉर्ड इरविन–गांधी-आंबेडकर प्रक्रिया ने उस आदिवासी–आदवंशी जातिविहीन आंदोलन को भी अस्थिर बना दिया जो अपनी अलग पहचान, अलग विश्वदृष्टि और अलग सांस्कृतिक‑धार्मिक लक्ष्यों पर आधारित था। आज, जब वंचित वर्ग अभी भी राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से उपेक्षित हैं, तो यह सवाल फिर से उठता है कि क्या पृथक पहचान, पृथक निर्वाचन और पृथक धर्म की मांग आज भी तर्कसंगत, नैतिक और राजनीतिक रूप से अनिवार्य है या यह सिर्फ “विखंडन” की बात है ?
- पृथक निर्वाचन और डबल वोट: आंबेडकर का राजनीतिक दृष्टिकोण
ब्रिटिश भारत में “कम्युनल अवार्ड” (1932) ने दलितों और “Depressed Classes” को अलग निर्वाचन क्षेत्र और ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्से मैकडॉनल्ड ने इसे आधिकारिक रूप से स्वीकृत किया था। इसके तहत दलित/वंचितों के लिए अलग मतदान क्षेत्र थे, जहाँ केवल दलित अपने दलित उम्मीदवारों को चुनें, इसे ही “पृथक निर्वाचन” और कई लेखों में “डबल वोट का अधिकार” कहा जाता था, क्योंकि दलित अपने लिए अलग मत भी डाल सकते थे और सामान्य निर्वाचन में भी हिस्सा ले सकते थे।
आंबेडकर जी का यह तर्क था कि बिना पृथक निर्वाचन के दलितों की जीवट राजनीतिक रूप से “हिंदू जनता” के कर्ज़ में बंधी रहेगी; जातिवादी बहुमत कभी भी दलित नेताओं को अपनी मुख्यधारा में असली शक्ति नहीं देगा। गांधी, दूसरी ओर, चाहते थे कि दलितों को अलग निर्वाचन से वंचित करके उन्हें “हिंदू जाति” के अंदर रखा जाए, ताकि वे राष्ट्रीय आंदोलन का एकजुट हिस्सा बने रहें। पूना समझौते में अंततः अलग निर्वाचन को छोड़कर “संयुक्त निर्वाचन” में आरक्षित सीटें और बढ़ी हुई दलित सीटें मान ली गईं, जिससे दलित नेताओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो मिला, लेकिन वे अब भी बहुमत के रहने की राजनीति के शिकार बने रहे।
- लॉर्ड इरविन, गांधी और “जातिविहीन मुहिम” का कमज़ोर पड़ना लॉर्ड इरविन के समय भले ही “कम्युनल अवार्ड” ने दलित वर्गों को अलग निर्वाचन का दर्जा दिया, लेकिन गांधी‑आंबेडकर संवाद और तब लगाए गए अनशन ने इस योजना को बदल दिया। इस पूरी प्रक्रिया में आदिवासी और अन्य आदवंशी समुदाय जो अपने अलग जीवन‑विधि, अलग धर्म और अलग भाषा‑संस्कृति के आधार पर “जातिविहीन मुहिम” की ओर बढ़ रहे थे उस राजनीतिक बातचीत के बाहर रह गए जिसमें दलित‑हिंदू द्वंद्व बाज़ी ज़्यादा दिखाई दे रहा था।
आदवंशी समुदायों की स्वतंत्र धार्मिक‑सांस्कृतिक पहचान को बाद के दशकों में या तो “हिंदू” दर्जा देकर भारतीय राष्ट्रीय राजनीति में घोल दिया गया, या फिर उन्हें “tribal” या “OBC” जैसे उप‑श्रेणी में दबाकर रखा गया। इससे उनकी जातिविहीन, प्रकृति‑केंद्रित, आदवंशी धार्मिक‑सांस्कृतिक परिकल्पना (जैसे देव‑देवी केंद्रित स्थानीय धर्म, परंपरागत आचार) को राज्य और राजनीतिक भाषा में मान्यता नहीं मिली, और वे अपनी असली आत्म‑पहचान के बजाय बाहरी सरकारी वर्गीकरणों के अनुसार बाँटे जाते रहे। - पृथक पहचान की आवश्यकता: क्यों?
आज भी वंचित, उपेक्षित और आदवंशी समुदाय निर्णय‑निर्माण की प्रक्रिया से दूर बने हुए हैं। आरक्षण और आर्थिक योजनाएँ तो अस्तित्व में हैं, लेकिन उनकी नीतिगत दिशा ज़्यादातर बाहरी नेताओं, पार्टी‑मशीनों और बहुमत‑संस्कृति के हाथों में है। इसी स्थिति में पृथक पहचान की मांग उभरती है: वंचित और आदवंशी समुदायों को न केवल जाति या आदिवासी के रूप में पहचाना जाए, बल्कि उनकी अलग ऐतिहासिक विरासत, अलग भाषा‑संस्कृति और अलग राजनीतिक दृष्टि को भी स्वीकृति दी जाए।
जब तक आदवंशी समुदाय खुद को “हिंदू” या “other backward” श्रेणी में घुला हुआ मानते रहेंगे, वे कभी भी अपनी आत्म‑पहचान के आधार पर नीतिगत दबाव डालने का पूरा अधिकार नहीं उठा पाएँगे। [7][9] पृथक पहचान का अर्थ यह नहीं है कि वे राष्ट्रीय व्यवस्था से अलग खड़े हों, बल्कि यह है कि उनकी माँग‑संरचना स्वतंत्र रूप से परिभाषित हो सके और राज्य‑संस्थान उनकी अलग वास्तविकता को वैध रूप से मानें।
- पृथक निर्वाचन: डबल वोट का आधुनिक तर्क
पूना समझौते के बाद जो डबल वोट का अधिकार खोया, वह बस एक तकनीकी चुनावी विशेषता नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक सुरक्षा तंत्र था: दलित‑आदवंशी मतदाता अपने विशेष उम्मीदवार का चयन कर सकते थे और साथ ही सामान्य निर्वाचन में भी भागीदार रह सकते थे। आज की चुनावी प्रणाली में वंचित समुदाय के उम्मीदवार अक्सर पार्टी‑मशीनों के आदेश से चुने जाते हैं, और उनकी नियुक्ति वास्तव में समुदाय के आंतरिक विकल्प‑प्रक्रिया पर आधारित नहीं होती।
एक आधुनिक रूप में पृथक निर्वाचन यह सुनिश्चित कर सकता है कि:
- वंचित और आदवंशी समुदाय अपने लिए निर्णय‑निर्माण कर सकें,
- उनके निर्वाचित प्रतिनिधि उनकी वास्तविक जीवन‑स्थिति के पक्षधर हों,
- राजनीतिक पार्टियाँ उन्हें मतदान‑मशीन के रूप में नहीं, बल्कि नीतिगत भागीदार के रूप में देखें। “डबल वोट के अधिकार” की आधुनिक व्याख्या वह भी हो सकती है कि वंचित वर्ग अपने आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में अपने उम्मीदवार चुनें और सामान्य निर्वाचन में भी भाग लें इससे उनकी राजनीतिक शक्ति दोहरी हो जाए, न कि घटे।
- पृथक धर्म: आदवंशी आत्म‑सम्मान की नींव
आज भी अनेक राज्यों में आदिवासी‑आदवंशी समुदायों को अपनी अलग धार्मिक पहचान की मान्यता के लिए लड़ना पड़ रहा है। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आदिवासी समुदायों के लिए “अलग धर्म‑संहिता” या “अलग धर्म कोड” की मांग राजनीतिक विवाद बन चुकी है, क्योंकि बहुत‑से राजनीतिक दल उन्हें अलग धर्म मानने के बजाय उन्हें पुराने धार्मिक ढांचे में दबाकर रखना चाहते हैं।
आदिवासी और आदवंशी धर्म अक्सर प्रकृति‑केंद्रित, पूर्वज‑पूजा, ग्राम‑परंपराओं और उपरि‑स्थानीय देवता‑प्रणालियों पर आधारित होते हैं, जो वर्ग‑आधारित धर्मों से संरचनात्मक रूप से भिन्न हैं।
उन्हें “हिंदू” या “अन्य” में भरकर रखना उनकी सांस्कृतिक विविधता को तोड़ता है और उनकी आत्मसम्मान की आधार‑स्तंभ को कमज़ोर करता है। पृथक धर्म की मान्यता का अर्थ यह है कि राज्य उनकी धार्मिक‑सांस्कृतिक विरासत को स्वतंत्र रूप से देखे, उनकी धार्मिक गतिविधियों को उनकी अपनी शर्तों पर स्वीकार करे और उनकी धार्मिक संस्थाओं को भी वैध रूप मिले।
- वंचित सबल कैसे बनें? तर्क और नीतिगत दिशा
वंचित, उपेक्षित और आदवंशी समुदाय तब तक सच्चे अर्थ में सशक्त नहीं हो सकते जब तक उनकी:
- पृथक पहचान,
- पृथक निर्वाचन और
- पृथक धर्म
की मान्यता उनके अस्तित्व के केंद्र में न हो। आरक्षण और अच्छी‑मजदूर‑योजनाएँ आवश्यक हैं, लेकिन वे केवल “समावेशन” की भाषा में बहस करती हैं; पृथक पहचान‑आधारित राजनीति “स्व‑निर्धारण” की भाषा बोलती है।
नीतिगत कदम :
- आदवंशी और आदिवासी समुदायों के लिए केंद्र/राज्य स्तर पर “अलग धर्म‑श्रेणी” या “अलग धर्म‑कोड” की मान्यता देना।
- आरक्षित सीटों के लिए स्व‑निर्धारित निर्वाचन प्रक्रिया का प्रावधान यानी वंचित समुदाय के लिए निर्वाचन की आंतरिक रीति और अलग निर्वाचन‑समितियाँ।
- संवैधानिक/संसदीय तंत्र में आदवंशी आयोग जैसी संस्था, जो वंचित वर्गों की धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा का दायित्व निभाए।
{ जातिविहीन मुहिम को वापसी देना}
डॉ. आंबेडकर और गांधी के समझौते के बाद जो पृथक निर्वाचन और डबल वोट का अधिकार गायब हो गया, वह सिर्फ एक इतिहास का पन्ना नहीं है वह उस राजनीतिक संरचना का हिस्सा था जो वंचित वर्ग को खुद‑निर्धारित बनाने की कोशिश कर रही थी।
लॉर्ड इरविन–गांधी प्रक्रिया ने आदिवासी‑आदवंशी समुदायों की जातिविहीन, स्वतंत्र धार्मिक‑राजनीतिक मुहिम को दबाने या कमज़ोर करने में भी अहम भूमिका निभाई।
आज फिर से वंचित, उपेक्षित और आदवंशी समुदाय की आवाज़ बढ़ रही है, लेकिन बिना पृथक पहचान, पृथक निर्वाचन और पृथक धर्म के इस आवाज़ को वास्तविक राजनीतिक शक्ति नहीं मिल सकती।
जातिविहीन मुहिम को वापसी देना है, तो उसे इन तीन स्तम्भों पृथक पहचान, पृथक निर्वाचन, पृथक धर्म के आधार पर नया संवैधानिक और नीतिगत रूप देना होगा, न कि उन्हें फिर से बहुमत‑संस्कृति के अंदर घोल देना।
डब्लू पी आदवंशी
(वंचित उपेक्षित वर्गों के लिए सशक्त माँग‑संरचना की आह्वान)

