Tuesday, September 29, 2026
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आधुनिक जीवन की आपाधापी, सोशल मीडिया के प्रभाव और भौतिकवादी दृष्टिकोण ने इंसान को ऐसा मुखौटा पहनने पर मजबूर कर दिया है, जहाँ वह अंदर से कुछ और बाहर कुछ और होने का करता है नाटक

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आज का आधुनिक मनुष्य एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ ‘होने’ से ज्यादा ‘दिखने’ का महत्व है। भागदौड़ भरी जिंदगी, सोशल मीडिया की चकाचौंध और भौतिकवादी अंधी दौड़ ने इंसान को एक ऐसे दोहरे चरित्र में ढ़ाल दिया है, जहाँ उसके असली चेहरे पर एक बनावटी मुखौटा लगा हुआ है। वह अंदर से कुछ और है और बाहर कुछ और होने का ढोंग कर रहा है । फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स ने ‘परफेक्ट लाइफ’ का एक झूठा पैमाना तय कर दिया है। लोग अपनी उदासी, अकेलेपन और संघर्ष को छिपाकर केवल अपनी खुशियाँ, छुट्टियाँ और सफलताएँ ही दुनिया को दिखाना चाहते हैं। ‘लाइक्स’ और ‘कमेंट्स’ की भूख ने इंसान को अपनी असलियत छिपाने पर मजबूर कर दिया है। आज समाज में किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चरित्र या विचारों से नहीं, बल्कि उसकी गाड़ी, बंगले, ब्रांडेड कपड़ों और बैंक बैलेंस से होता है। इस दिखावे की संस्कृति में बने रहने के लिए लोग कर्ज लेकर भी अमीर दिखने का नाटक करते हैं।
आज महानगरों की व्यस्त जिंदगी में किसी के पास दूसरे के दुख दर्द सुनने का समय नहीं है। कमजोर दिखने पर लोग फायदा उठा सकते हैं, इसी डर से इंसान हर वक्त ‘मैं ठीक हूँ’ और ‘मैं बहुत खुश हूँ,’ का मुखौटा पहने रहता है। बाहर से हंसता हुआ दिखने वाला इंसान अंदर से कितना खोखला हो रहा है । जब भीतर का सच और बाहर का नाटक आपस में टकराते हैं, तो अवसाद (डिप्रेशन) और गहरी मानसिक अशांति का जन्म होता है। आज लोग भीड़ में होकर भी अकेले हैं क्योंकि उनके रिश्ते वास्तविक नहीं, बल्कि उनके मुखौटों के बीच के समझौते हैं।इसलिए हमें यह समझना होगा कि जीवन में उतार-चढ़ाव आना, असफल होना और दुखी होना पूरी तरह से सामान्य है। जब तक हम भौतिकवाद की अंधी दौड़ को छोड़कर सादगी, वास्तविक संवाद और अपने भीतर के एकांत से नहीं जुड़ेंगे, तब तक यह मुखौटा हमारे चेहरे को झुलसाता रहेगा। दुनिया को दिखाने के लिए जीने के बजाय, खुद के लिए जीना ही इस आधुनिक त्रासदी का एकमात्र समाधान है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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