मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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क्रांतिकारी विचारक महात्मा ज्योतिराव फुले और बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ‘मानसिक गुलामी’ को दुनिया की सबसे बड़ी गुलामी मानते थे। भारत में इस मानसिक गुलामी को थोपने में रूढ़िवादी धार्मिक कुरीतियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। सदियों से धर्म और पाखंड के नाम पर छुआछूत और अंधविश्वास फैलाकर इंसानों को आपस में ही बांट दिया गया। यही सामाजिक भेद-भाव आज भी हमारे देश की तरक्की में सबसे बड़ा बाधक है। सच तो यह है कि जब किसी समाज का ज़मीर ही गुलामी का आदी हो जाए, तो उसकी सामूहिक ताक़त अपना वजूद खो देती है । डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्वतंत्र भारत की नींव स्वतंत्रता, न्याय और समता की आधारशिला पर रखी थी। उन्होंने धर्म के नाम पर जिस जातिगत उत्पीड़न की अंतहीन पीड़ा को खुद झेला, वह नहीं चाहते थे कि आने वाली पीढ़ियां भी उस दर्द से गुज़रें। इसीलिए उन्होंने हमेशा सामाजिक और मानसिक गुलामी को राजनीतिक गुलामी से कहीं बड़ी चुनौती माना।
आज़ादी के 79 वर्ष बाद हमारा समाज आज भी कई तरह की सामाजिक, आर्थिक और मानसिक असमानताओं से जूझ रहा है । एक तरफ सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा है, तो दूसरी तरफ देश का एक बड़ा तबका आज भी भूखे पेट सोने को मजबूर है।बाज़ारों में गर्म कपड़ों की भरमार है, फिर भी हर साल फुटपाथों पर लोग कड़ाके की ठंड से दम तोड़ देते हैं। वहीं महंगाई का पारा आसमान छू रहा है और देश का पढ़ा-लिखा युवा वर्ग रोज़गार के लिए दर-दर भटक रहा है। इन विकट और विपरीत परिस्थितियों के बीच आज का गरीब, बेसहारा और बेरोज़गार युवा जाने-अनजाने में एक नई ‘सामाजिक और आर्थिक गुलामी’ का शिकार हो रहा है। जब तक हम मानसिक तौर पर आज़ाद होकर इन विसंगतियों के खिलाफ खड़े नहीं होंगे, तब तक बाबा साहेब के सपनों का भारत अधूरा रहेगा।
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

