मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मीठी वाणी और
सम्मानजनक शब्द एक कट्टर दुश्मन के दिल को भी पिघला सकते हैं । जिस प्रकार घाव भरने के लिए मरहम की जरूरत होती है, वैसे ही बिगड़े हुए रिश्तों को सुधारने के लिए प्रेमपूर्ण शब्द ही एकमात्र सहारा होते हैं । कबीरदास जी ने भी अपने दोहे में कहा कि “ऐसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय” जिसका अर्थ है कि हमें अहंकार को त्याग कर ऐसी मधुरवाणी बोलनी चाहिए, जिसे सुनकर दूसरों को सुख और शांति मिले । जब हमारी वाणी दूसरों को प्रसन्र करती है, तो उससे हमारा अपना मन भी शांत और शीतल (प्रसन्र) हो जाता है।
कभी-कभी एक गलत शब्द या बिना सोचे-समझे कही गई कड़वी बातें वर्षों पुरानी गहरी दोस्ती को दुश्मनी में बदल देती है, जब विश्वास और संवाद में कमी आती है, तो शब्दों का दूरुपयोग ही दरार पैदा करता है क्योंकि शब्दों में वह धार होती है, जो बिना खून बहाए घायल कर सकती है, वहीं शीतल शब्द जलते हुए मन को शांत कर देते हैं। इसलिए, किसी भी रिश्ते की नींव रखते समय या उसे निभाते समय अपने शब्दों के चयन के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

