मूकनायक/ देश
“राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा”
एक समय भगवान राजगृह के वेणुवन, कलन्दकनिवाप में विहार कर रहे थे ।
उस समय सिगाल गृहपति-पुत्र सवेरे उठकर राजगृह से निकल भीगे-वस्त्र, भीगे-केश, पुर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, ऊपर, और नीचे सभी दिशाओं को नमस्कार कर रहा था। उसे देख भगवान सिगाल के पास गए और वह क्या कर रहा है ऐसा पूछा। सिगाल ने कहा मेरे पिता ने मरते समय कहा था- बेटा दशों दिशांओं को नमस्कार करना चाहिए । इसलिए मैं दशों दिशांओं को नमस्कार करता हूं।
भगवान ने कहा- यह सही नमस्कार नहि जो तेरे पिता ने नमस्कार करने के लिए कहा है।
गृहपति-पुत्र! अरिय धम्म में छ: दिशाओं को नमस्कार इस प्रकार नही किया जाता।
इन घर्मों का पालन करना ही सही नमस्कार होता है-
- चार कर्म-क्लेशोका नाश
- प्राणी हत्या कर्म क्लेश का नाश
- चोरी कर्म क्लेश का नाश
- व्यभिचार कर्म क्लेश का नाश
- झूठ बोलना कर्म क्लेश का नाश. ।
- चार पाप के स्थान-
- राग के रास्ते में जाकर पाप-कर्म नही करना
- द्वेष के रास्ते में जाकर पाप-कर्म नही करना
- मोह के रास्ते में जाकर पाप-कर्म नही करना
- भय के रास्ते में जाकर पाप-कर्म नही करना
- छ: सम्पत्ति के नाश के कारण-
- शराब- नशा आदि सम्पत्ति के नाश का कारण है।
- संध्या समय चौरस्ते की सैर आदि सम्पत्ति के नाश का कारण है।
- नाचगान, तमाशा आदि सम्पत्ति के नाश का कारण है।
- जुआ खेलना आदि सम्पत्ति के नाश का कारण है।
- बुरे मित्र आदि सम्पत्ति के नाश का कारण है।
- मित्र और अमित्र –
इन चारों को मित्र के रुप में अमित्र जानना चाहिए।
- पर- धनहारक को मित्र के रुप में अमित्र जानना चाहिए।
- केवल बात बनाने वाले ( बातूनी )मित्र के रुप में अमित्र जानना चाहिए।
- सदा प्रिय ( खुशामदी ) वचन बोलने वाले मित्र के रुप में अमित्र जानना चाहिए।
– हानिकारक कृत्यों में सहायक मित्र के रुप में अमित्र जानना चाहिए।
मित्र कौन?
इन चारों को मित्र मानना चाहिए।
- उपकारी
- समान सुखी, दु:खी
- हितवादी
- अनुकंपक जो मित्र के धन-सम्पत्ति होने से खुश नहि होता, न होने से भी खुश नहि होता, मित्र की निंदा करने वाले को रोकता है, प्रशंसा करने पर प्रशंसा करता है।
- छ: दिशाओंकी पूजा-
“गृहपति-पुत्र! यह छ:—दिशाएं है –
(१) माता-पिता को पूर्व-दिशा ।
(२) आचार्यो को दक्षिण-दिशा ।
(३) पुत्र-स्त्री को पश्चिम-दिशा।
(४) मित्र-अमात्यो को उत्तर-दिशा।
(५) दास-कर्मकर को नीचे की दिशा ।
(६) श्रमण-ब्राह्मणो को ऊपर की दिशा ।
- माता पिता की सेवा—
“गृहपति-पुत्र । पांच तरह से माता-पिताकी सेवा करना चाहिए
(१) (इन्हों ने मेरा) भरण-पोषण किया है, अत: मुझे (इनका) भरण-पोषण करना चाहिए ।
(२) ( इन्हों ने मेरा काम किया है, अत: मुझे इनका काम करना चाहिए ।
(३) इन्होंने कुल-वंश कायम रक्खा, अत: मुझे कुल-वंश कायम रखना चाहिए ।
(४) इन्होंने मुझे विरासत दिया,अत: मुझे दायज्ज प्रतिपादन करना चाहिए ।
(५) मृत प्रेतो के निमित्त श्राद्ध-दान देना चाहिए ।
इस प्रकार पांच तरह से सेवित (माता-पिता) पुत्र पर पांच प्रकार से अनुकंपा करते है-
(१) पाप से निवारित करते है ।
(२) पुण्य में लगाते है ।
(३) शिल्प सिखलाते है ।
(४) योग्य स्त्री से संबंघ कराते है ।
(५) समय पाकर विरासत निष्पादन करते है ।
गृहपति-पुत्र! इन पांच बातों से पुत्र द्धारा माता-पिता-रुपी पूर्वदिशा का प्रत्युपस्थान होता है ।
इस प्रकार इस (पुत्र) की पूर्व दिशा सुरक्षित क्षेम-युकत, भय-रहित होती है ।
- आचार्यकी सेवा-
“गृहपति-पुत्र! पांच बातों से शिष्य को आचार्य-रुपी दक्षिण-दिशा का प्रत्युपस्थान करना चाहिए ।
(१) उत्थान (=तत्त्परता) से,
(२) उपस्थान (=सेवा) से,
(३) सुश्रूषा से,
(४) परिचर्या=सत्संग से,
(५) सत्कार-पूर्वक शिल्प सीखने से ।
गृहपति-पुत्र! इस प्रकार पांच बातों से शिष्यद्धारा आचार्य सेवित हो, पांच प्रकार से शिष्यपर अनुकंपा करते है-
(१) सु-विनय से युक्त करते है ।
(२) सुन्दर शिक्षा को भली-प्रकार सिखलाते है ।
(३) ‘हमारी (विधाये) परिपूर्ण रहेगी’ सोच सभी शिल्प सभी श्रुत (=विद्या)को सिखलाते है ।
(४) मित्र-अमात्यों को सुप्रतिपादन करते है ।
(५) दिशा की सुरक्षा करते है ।
3.”पत्नि की सेवा-
“गृहपति-पुत्र! पांच प्रकार से स्वामी को भार्या-रुपी पश्चिम-दिशा का प्रत्युपस्थान करना चाहिए —
(१) सन्मान से,
(२) अपमान न करने से,
(३) अतिचार (पर-स्त्री-गमन आदि) न करेनेञसे, (४) ऐश्वर्य-प्रदान से,
(५) अलंकार-प्रदान से गृहपति-पुत्र ।
इन पांच प्रकारों से स्वामि द्धारा भार्यारुपी पश्चिम-दिशा का प्रत्युपस्थान होनेपर,
(वह) स्वामि पर पांच प्रकार से अनुकंपा करती है-
(१) (भार्या द्धारा) कर्मान्त (=काम-काज) भली प्रकार होते है ।
(२) परिजन (=नौकर-चाकर) बश में रहते है । (३) (स्वंय) अतिचारिणी नही होती ।
(४) अर्जित की रक्षा करती है ।
(५) सब कामों में निरालस और दक्ष होती है ।
- मित्रों की सेवा-
“गृहपति-पुत्र! पांच प्रकार से मित्र-अमात्य-रुपी उत्तर-दिशाका प्रत्युप-स्थान करना चाहिए —
(१) दान से,
(२) प्रिय-वचन से,
(३) अर्थ-चर्या (=कामकर देने) से,
(४) समानता (प्रदर्शन) से,
(५) विश्वास-प्रदान से ।
गृहपति-पुत्र! इन पांच प्रकारों से प्रत्युपस्थान की गई मित्र-अमात्यरुपी उत्तर-दिशा, पांच प्रकार से (उस) कुल-पुत्रपर अनुकंपा करती है—
(१) प्रमाद (=भूल, आलस्य)कर देनेपर रक्षा करते है ।
(२) प्रमत्तकी संपत्तिकी रक्षा करते है ।
(३) भय के समय शरण (=रक्षक) होते है ।
(४) आपत्काल में नही छोळते ।
(५) दूसरी प्रजा (=लोग) भी (ऐसे मित्र-अमात्य वाले) इस पुरुषका सत्कार करती है ।
- सेवक की सेवा-
“गृहपति-पुत्र! पांच प्रकार से अरियक (=मालिक) को दास-कर्मकर रुपी
निचली-दिशाका प्रत्युपस्थान करना चाहिए —
(१) बलके अनुसार कर्मान्त (=काम) देने से,
(२) भोजन-वेतन (=भत्त-वेतन)-प्रदान से,
(३) रोगि-सुश्रूषा से,
(४) उत्तम रसो (वाले पदार्थो) को प्रदान करने से,
(५) समयपर छुट्टी (=वोसग्ग) देने से ।
गृहपति-पुत्र! इन पांचों प्रकारों से प्रत्युपस्थान किए जाने पर दास-कर्म-कर पांच प्रकार से मालिक पर अनुकंपा करते है-
(१) (मालिक से) पहिले (विस्तर से) उठ जोनेवाले होते है ।
(२) पीछे सोनेवाले होते है ।
(३) दिएको (ही) लेनेवाले होते है ।
(४) कामों को अच्छी तरह करनेवाले होते है ।
(५) कीर्ति-प्रशंसा फैलानेवाले होते है ।
- साधु-ब्राह्मणकी सेवा-
“गृहपति-पुत्र! पांच प्रकार से कुल-पुत्र को श्रमण-ब्राह्मण-रुपी ऊपर की-दिशा का प्रत्युपस्थान करना चाहिए-
(१) मैत्री-भाव-युक्त कायिक-कर्म से,
(२) मैत्री-भाव-युक्त वाचिक-कर्म से,
(३) ० मानसिक-कर्म से,
(४) (उनके लिए) खुला द्रार रखने से,
(५) आमिष (=खान-पानकी वस्तु) के प्रदान करने से ।
गृहपति-पुत्र! इन पांच प्रकारों से प्रत्युपस्थान किए गए श्रमण-ब्राह्मण इन छ: प्रकारों से कुल-पुत्रपर अनुकंपा करते है-
(१) पाप (=बुरा) से निवारण करते है ।
(२) कल्याण (=भलाई) मे प्रवेश कराते है । (३) कल्याण (-प्रदान)-द्वारा इनपर अनुकंपा करते है।
(४) अ-श्रुत (विद्या) को सुनाते है ।
(५) श्रुत (विद्या) को दृढ कराते है ।
(६) स्वर्ग का रास्ता बतलाते है ।”
माता-पिता पूर्व दिशा है,
आचार्य दक्षिण दिशा ।
पुत्र-स्त्री पश्चिम दिशा है,
मित्र-अमात्य उत्तर दिशा,
दास-कर्मकर नीचे की दिशा है,
श्रमण-ब्राह्मण ऊपरकी दिशा ।
गृहस्थ को अपने कुल में इन दिशाओं कोअच्छी तरह नमस्कार करना चाहिए।
ऐसा कहने पर सिगाल गृहपति-पुत्रने भगवान से कहा—“आश्चर्य । भन्ते ।। अद्भुत । भन्ते ।। आज से मुझे भगवान अंजलि-बद्ध शरणागत उपासक धारण करे ।”
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref: सिगालोवाद-सुत्त :दीध-निकाय
14.11.2024
संकलन: रवि शेखर बौद्ध मेरठ,
मंडल प्रभारी मूकनायक

