मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जब मनुष्य का हृदय किसी दूसरे के दुःख, पीड़ा या वेदना को देखकर स्वयं द्रवित हो उठता है, तो उसी क्षण ‘सच्ची करुणा’ का जन्म होता है। दूसरों के दुःख को केवल देखना पर्याप्त नहीं है, उसे अपने भीतर महसूस करना ही ‘परदुख कातरता’ कहलाता है। यही भाव एक मनुष्य को दूसरे प्राणी से जोड़ता है और यही इंसानियत की असली पहचान है। करुणा कोई दिखावा या केवल सहानुभूति का शब्द नहीं है, बल्कि यह वह आंतरिक प्रकाश है, जो व्यक्ति को निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करने के लिए प्रेरित करता है। जब हम दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा मानकर उसे दूर करने का प्रयास करते हैं, तभी हमारा जीवन सार्थक बनता है।
आज के आधुनिक और भागदौड़ भरे युग में, जहाँ भौतिक सुख-सुविधाओं की होड़ लगी है, इंसानियत का यह भाव और भी प्रासंगिक हो जाता है। केवल अपनी सफलता और सुख के बारे में सोचना संकुचित मानसिकता को दर्शाता है। इसके विपरीत, किसी असहाय की मदद करना, किसी गिरते हुए को उठाना और किसी के आँसू पोंछना ही मनुष्यता का उत्कर्ष है। अंततः, दूसरों के दुःख में दुखी होने की क्षमता ही हमें एक पत्थर दिल इंसान से एक सहृदय मानव बनाती है। यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति इस करुणा को अपने भीतर स्थान दे, तो यह संसार भय, वैमनस्य और पीड़ा से मुक्त होकर प्रेम तथा शांति का पावन धाम बन सकता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

