मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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इस संसार में गहरे जख्म अपने ही देते हैं, जो सहे भी नहीं जाते और किसी से कहे भी नहीं जाते। यह पंक्ति मानव जीवन के एक अत्यंत कड़वे और शाश्वत सत्य को उजागर करती है। किसी अजनबी द्वारा दिया गया धोखा या चोट इंसान को कुछ समय के लिए परेशान कर सकती है, लेकिन जब युद्ध की यह बिसात घर के भीतर बिछ जाए और मोहरे अपने ही बन जाएं तो इंसान भीतर से पूरी तरह टूट जाता है। घर केवल चार दीवारी का ढांचा नहीं होता, बल्कि यह वह सुरक्षित स्थान है, जहाँ इंसान दुनिया भर की थकान, कड़वाहट और संघर्षों को भूलकर सुकून की सांस लेने आता है। जब इसी सुरक्षित पनाहगाह में कलह, अविश्वास और अपनों की बेरुखी की दीवारें खड़ी होने लगें तो व्यक्ति का सबसे बड़ा संबल ही उसकी कमजोरी बन जाता है। जिस छत को ढाल होना चाहिए था, वही जब तलवार बनकर चुभने लगे, तो आत्मा लहूलुहान हो जाती है। अपनों से हारना तो वैसे ही सर्वनाश है। दुनिया से लड़ते वक्त परिवार पीछे खड़ा होता है, लेकिन जब परिवार ही सामने खड़ा हो तो इंसान अकेलेपन के गहरे कुएं में गिर जाता है।
घर के इस मूक युद्ध का सबसे भयानक पहलू यह है कि इंसान इसका ढिंढोरा बाहर नहीं पीट सकता। समाज के डर से, ‘लोग क्या कहेंगे’ के संकोच में वह भीतर ही भीतर घुटता रहता है। यह घुटन धीरे-धीरे उसे मानसिक और शारीरिक रूप से खोखला कर देती है। बाहर मुस्कुराता हुआ चेहरा भीतर एक मलबे में तबदील हो जाता है। महाभारत का युद्ध इसका जीवंत उदाहरण है कि जब अपनों से लड़ना पड़ा, तो गांडीवधारी अर्जुन के हाथ से भी धनुष छूट गया था और वे रथ पर बैठ रोने लगे थे। इसलिए, घर को युद्ध का मैदान बनने से बचाना हर सदस्य की जिम्मेदारी है। जहाँ संवाद कम और अहंकार ज़्यादा हो जाता है, वहीं से इस युद्ध की शुरुआत होती है। यदि समय रहते अपनों को समझने, थोड़ा झुकने और प्रेम को अहमियत देने का प्रयास किया जाए तो इस आंतरिक बिखराव से बचा जा सकता है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

