मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आज के दौर में लोगों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कारण संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। ऐसे परिवर्तनशील और व्यस्त माहौल में जब कोई व्यक्ति परिवार के बिखराव को रोकने, छोटों की गलतियों को नजरअंदाज करने और बड़ों का सम्मान बनाए रखने की कोशिश करता है, तो उसे अक्सर विद्रोही या दखल देने वाला मान लिया जाता है। यह बहुत ही सत्य और मार्मिक विचार है कि जो व्यक्ति परिवार को एकजुट रखने का प्रयास करता है, अक्सर त्याग और अनुशासन के कारण वही अपनों की आलोचना का केंद्र बन जाता है। लेकिन, उस व्यक्ति की असली कीमत तब समझ आती है, जब रिश्तों की डोर टूट जाती है और बिखरने के बाद परिवार को संभालने वाला कोई नहीं बचता।
परिवार को एक साथ रखने के लिए एक इंसान को अपनी कई इच्छाओं, गुस्से और स्वाभिमान का समझौता करना पड़ता है। अक्सर लोग उसके इस त्याग को उसकी कमजोरी या दखलअंदाजी मान लेते हैं। जब तक वह इंसान सबके बीच की कड़ियों को जोड़कर रखता है, तब तक उसकी बातें लोगों को ‘रोक-टोक’ या ‘पुरानी सोच’ लगती हैं, इसलिए वह सबकी आँखों में चुभने लगता है। जब वह जोड़ने वाला इंसान थककर दूर हो जाता है या नहीं रहता, तब छोटी-छोटी गलतफहमियां बड़े विवाद बन जाती हैं। तब जाकर लोगों को समझ आता है कि सबको बांधकर रखने वाली डोर कितनी मजबूत और जरूरी थी। रिश्तों को तोड़ना बहुत आसान है, लेकिन टूटे हुए को समेटने के लिए बहुत बड़े दिल और धैर्य की जरूरत होती है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

