मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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आज के दौर में लोग अक्सर अपने आस-पास लोगों की संख्या देखकर खुद को भाग्यशाली या लोकप्रिय मान लेते हैं। सोशल मीडिया के इस जमाने में ‘मित्रों’ की संख्या हजारों में हो सकती है, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है। किसी ने ठीक ही कहा है कि भीड़ इकट्ठा करने से कोई अमीर नहीं होता, संकट के समय जो ढ़ाल बनकर खड़ा हो जाए, वही असली मित्र होता है । जब हमारे पास सुख, समृद्धि और सफलता होती है, तो लोगों की एक बड़ी भीड़ हमारे आस-पास खुद-ब-खुद जमा हो जाती है। ऐसे लोग केवल हमारे अच्छे समय के साथी होते हैं, जिन्हें ‘सुख के सब साथी’ कहा जाता है। इस तरह की भीड़ से किसी का जीवन वैचारिक या भावनात्मक रूप से समृद्ध (अमीर) नहीं होता। इसके विपरीत, सच्चा मित्र वह होता है जो हमारे बुरे वक्त में, हमारी असफलताओं में और संकट के क्षणों में हमारे साथ खड़ा रहता है।
जब परिस्थितियां विपरीत होती हैं और सब साथ छोड़ देते हैं, तब सच्चा मित्र एक मजबूत ढ़ाल की तरह आगे आकर हमारी रक्षा करता है। वह हमें ना केवल हौसला देता है, बल्कि संकट से बाहर निकलने का रास्ता भी दिखाता है। असली अमीरी पैसों से या मतलबी लोगों के हुजूम से नहीं आंकी जा सकती। वास्तविक रूप से अमीर वह व्यक्ति है जिसके पास संकट के समय ढ़ाल बनने वाला कम से कम एक सच्चा मित्र हो। दिखावे की भीड़ हमें केवल भ्रम देती है, जबकि एक सच्चा मित्र हमें सुरक्षा और संबल देता है। हमें अपने जीवन में चापलूसों की भीड़ जुटाने के बजाय ऐसे सच्चे और ईमानदार रिश्ते बनाने चाहिए, जो वक्त की कसौटी पर खरे उतर सकें। सौ मतलबी दोस्तों से वह एक मित्र कहीं बेहतर है, जो संकट में परछाई की तरह साथ निभाए।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

