मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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बुद्ध पूर्णिमा, जिसे ‘बुद्ध जयंती’ या ‘वैशाख पूर्णिमा’ के नाम से भी जाना जाता है, बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए साल का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण दिन है। यह त्योहार केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को शांति, करुणा और मानवता का संदेश देने वाला एक महान अवसर है।ईसा पूर्व 563 में लुम्बिनी (नेपाल) में सिद्धार्थ गौतम का जन्म इसी दिन हुआ था। वर्षों की कठिन तपस्या के बाद बोधगया में ‘बोधिवृक्ष’ के नीचे उन्हें सत्य का ज्ञान (निर्वाण) इसी दिन प्राप्त हुआ। 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उन्होंने इसी दिन देह त्याग किया। इस प्रकार एक ही तिथि पर इन तीन महान घटनाओं का होना बुद्ध पूर्णिमा को आध्यात्मिक रूप से अद्वितीय बनाता है । लोग इस दिन सफेद वस्त्र धारण करते हैं और गरीबों को भोजन व दान देते हैं।
आज के दौर में, जब दुनिया हिंसा, ईर्ष्या और अस्थिरता से जूझ रही है, बुद्ध की शिक्षाएँ और भी महत्वपूर्ण हो गई हैं। उन्होंने ‘अष्टांगिक मार्ग’ के माध्यम से मनुष्य को सही दृष्टि, सही संकल्प और सही आचरण का रास्ता दिखाया। उनकी शिक्षा का मूल मंत्र है— “अप्प दीपो भव” अर्थात ‘अपना दीपक स्वयं बनो’।बुद्ध पूर्णिमा का त्योहार हमें याद दिलाता है कि सुख बाहरी भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन की शांति और दूसरों के प्रति करुणा रखने में है। यह दिन हमें जाति-पाति और भेदभाव से ऊपर उठकर प्रेम और भाईचारे के साथ जीने की प्रेरणा देता है। भगवान बुद्ध का जीवन और उनके विचार आज भी पूरी मानवता के लिए एक प्रकाश स्तंभ की तरह हैं, जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

