मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍️✍️
महात्मा ज्योतिबा फुले आधुनिक भारत के उन महान समाज सुधारकों में से हैं, जिन्होंने सामाजिक जड़ता को तोड़ने के लिए शिक्षा और समानता को अपना अस्त्र बनाया। उनका यह कथन—”यदि तुम परिवर्तन की राह पर चलते हो, तो तुम्हारे विरोध की शुरुआत तुम्हारे घर-परिवार से होगी”—मात्र एक विचार नहीं, बल्कि उनके स्वयं के जीवन का संघर्षपूर्ण यथार्थ था। फुले जी का मानना था कि समाज सदियों पुरानी रूढ़ियों, जातिवाद और अंधविश्वास की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। जब कोई व्यक्ति इन स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता है, तो सबसे पहले उसके अपने ही लोग असुरक्षित महसूस करते हैं। ज्योतिबा फुले ने जब शोषितों और महिलाओं की शिक्षा के लिए हाथ उठाया, तो उन्हें सबसे कड़ा विरोध अपनों से ही झेलना पड़ा। उनके पिता, गोविंदराव, समाज और धर्म के ठेकेदारों के दबाव में आ गए। परिणामस्वरूप, ज्योतिबा और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को घर छोड़ना पड़ा। उनके पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया, लेकिन फुले ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। उन्होंने साबित किया कि सामाजिक परिवर्तन की कीमत अक्सर व्यक्तिगत सुखों का त्याग होती है।
व्यक्ति अपने परिवार के भावनात्मक दबाव को यदि झेलकर अपने सिद्धांतों पर टिका रहता है, तभी वह व्यापक समाज का सामना करने का साहस जुटा पाता है । महात्मा फुले का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, लैंगिक समानता हो या जाति उन्मूलन, सुधार की पहली लड़ाई ‘स्व’ और ‘स्वजन’ से ही शुरू होती है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर अकेले चलने का साहस ही अंततः समाज में बड़े बदलाव की नींव रखता है। परिवर्तन की राह फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों भरा वह रास्ता है जो सुनहरे भविष्य की ओर जाता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

