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सामाजिक समानता, तर्कवाद और शोषित- वंचित समाज की मुक्ति के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले पेरियार ललई सिंह यादव भारतीय सामाजिक परिवर्तन के इतिहास के महत्वपूर्ण योद्धा थे। वे केवल लेखक और प्रकाशक नहीं बल्कि सामाजिक चिंतक, जन जागरणकर्ता, तर्कवादी और जाति-विरोधी आंदोलन के प्रखर कार्यकर्ता थे। उनका जीवन व्यक्तिगत संघर्षों, अध्ययन, वैचारिक परिवर्तन और सामाजिक न्याय के लिए निरंतर सक्रियता की प्रेरणादायी गाथा है।
पेरियार ललई सिंह यादव का जन्म 01 सितंबर 1911 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन कानपुर जनपद के ग्राम कठारा, रेलवे स्टेशन झींझक के निकट हुआ था। उनके पिता चौधरी गज्जू सिंह और माता मूलादेवी थीं। उनके पिता आर्य समाज के विचारों से प्रभावित तथा सामाजिक दृष्टि से जागरुक व्यक्ति थे। बचपन में उन्हें ‘लल्ला’ कहा जाता था, जो आगे चलकर ‘ललई’ के रूप में प्रसिद्ध हुए। जुलाई1922 में उनका प्रवेश लहरापुर के प्राथमिक विद्यालय में हुआ। इसके बाद उन्होंने औरैया जनपद के साहार स्थित जूनियर हाईस्कूल में शिक्षा प्राप्त की और हिंदी-उर्दू लेकर मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। शिक्षा ने उनके भीतर सामाजिक चेतना और तर्कशील विचारों की मजबूत नींव रखी। उन्होंने हिंदू और उर्दू के साथ धार्मिक, सामाजिक तथा ऐतिहासिक साहित्य का अध्ययन किया। आगे चलकर विभिन्न धार्मिक ग्रंथो रामायणों, पुराने और सामाजिक विचारों का अध्ययन करते हुए उन्होंने रूढ़ियों और जातिगत असमानता पर गंभीर प्रश्न उठाए।
1929 में1931तक उन्होंने फॉरेस्ट गार्ड की नौकरी की। नौकरी के इस प्रारंभिक अनुभव ने उन्हें ग्रामीण समाज और प्रशासनिक व्यवस्था को समझने का अवसर दिया।
21 अप्रैल1933 को वे ग्वालियर राज्य की सशस्त्र पुलिस में कनिष्ठ लिपिक के रूप में भर्ती हुए। नौकरी के दौरान उन्होंने कर्मचारियों और सैनिकों की कठिनाइयों को निकट से देखा तथा उनके संगठन और अधिकारों के लिए आवाज उठाई। ‘सिपाही की तबाही’ जैसी रचना में उनकी सामाजिक चेतना स्पष्ट दिखती है।
1946 में उन्होंने ग्वालियर में नों गैजेटेड मूलीचमैन पुलिस और आर्मी संघ की स्थापना की और उसके अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने पुलिस और सेवा में हड़ताल का आव्हान किया ब्रिटिश शासन और तत्कालीन सट्टा व्यवस्था के विरुद्ध इस प्रकार की गतिविधि को गंभीर अपराध माना गया।
29 मार्च 1947 को उन्हें उनके साथियों सहित गिरफ्तार कर भारतीय दंड विधान की धारा 131 के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया 6 नवंबर 1947 को विशेष अपराधिक सत्र न्यायाधीश ग्वालियर ने उन्हें 5 वर्ष के सत्संग कर आवास तथा ₹5 अर्थ दंड की सजा सुनाई। आजादी मिलने के बाद 12 जनवरी 948 को अपने साथियों के साथ जेल से बाहर आए।
1931 में उनका विवाह दुलारी देवी से हुआ था जो ग्राम जरैला रेलवे स्टेशन रूरा क्षेत्र के चौधरी सरदार सिंह यादव की पुत्री थीं और उनसे पुत्री शंकुतला का जन्म हुआ था। दुर्भाग्यवश पत्नी और पुत्री दोनों का असामयिक निधन हो गया, लेकिन इन व्यक्तिगत त्रासदियों के बावजूद उनका संकल्प नहीं टूटा और उन्होंने अपना जीवन समाज के व्यापक हित के लिए समर्पित कर दिया और दूसरा विवाह नहीं किया। ललई सिंह यादव डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों से गहराई से प्रभावित हुए।
जाति-व्यवस्था, सामाजिक असमानता और शोषण के विरुद्ध संघर्ष को उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। वे मानते थे कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है; सामाजिक समानता और मानसिक गुलामी की मुक्ति के बिना वास्तविक स्वतंत्रता अधूरी है।
इसी वैचारिक यात्रा में उनका जुड़ाव दक्षिण भारत के समाज सुधारक ई.वी. रामास्वामी ‘पेरियार’ से हुआ। उन्होंने पेरियार के तर्कवाद, आत्मसम्मान, जाति-विरोध और स्त्री-मुक्ति के विचारों को हिन्दी क्षेत्र में पहुँचाया। इसी कारण वे उत्तर भारत में ‘पेरियार ललई सिंह’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने पुस्तकों, प्रकाशन और लेखन को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनके जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय ‘सच्ची रामायण’ के प्रकाशन से जुड़ा है।
उनकी कुछ कृतियां सुप्रसिद्ध हैं जैसे 1.सिपाही की तबाही, 2.ब्राह्मणवादी राज में शोषितों पर राजनीतिक डकैती, 3.आर्यों का नैतिक पोल प्रकाश,4,शंभूक वध तथा पेरियार के विचारों से संबंधित साहित्य विशेष रूप से उल्लेख है।
पेरियार की कृति के हिंदी रूप ‘सच्ची रामायण’ को प्रकाशित कराने में ललई सिंह यादव की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उत्तर प्रदेश सरकार ने 8 दिसंबर1969 को इस पुस्तक की प्रतियों को जब्त करने का आदेश दिया। ललई सिंह यादव ने अधिवक्ता बनवारी लाल के माध्यम से इस कार्रवाई को न्यायालय में चुनौती दी। 19 जनवरी 1971 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पुस्तक की जब्ती के सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया तथा ललई सिंह यादव को मुकदमे के खर्च के रूप में ₹300 देने का भी आदेश दिया। बाद में मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। यह मामला उत्तर प्रदेश वर्सेस ललई सिंह यादव के नाम से जाना गया। मामला क्रिमिनल अपील नंबर 291 का 1971 था।16 सितंबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज करदी और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। यह प्रसंग अभिव्यक्ति और वैचारिक स्वतंत्रता के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना।
ललई सिंह यादव के जीवन में बौद्ध धम्म ग्रहण करना एक महत्वपूर्ण वैचारिक पड़ाव था। वे डॉ.अम्बेडकर के बौद्ध धम्म ग्रहण से गहराई से प्रभावित थे। बीमारी के कारण वे1956 में नागपुर में आयोजित ऐतिहासिक धम्म दीक्षा समारोह में शामिल नहीं हो सके थे। बाद में 21 जुलाई 1967 को उन्होंने कुशीनगर में महास्थविर भदन्त चंद्रमणि से विधिवत बौद्ध धम्म ग्रहण किया। उनके लिए यह केवल धार्मिक पहचान का प्रश्न नहीं था, बल्कि समानता, विवेक, करुणा और जाति-विहीन समाज का संकल्प था।
धम्म ग्रहण करने के बाद उन्होंने मानव-मर्यादा और सामाजिक बराबरी को अपने संघर्ष का आधार बनाया। बाद के वर्षों में वे रामस्वरूप वर्मा द्वारा स्थापित अर्जक संघ से भी जुड़े, और जाति, अंधविश्वास और सामाजिक वर्चस्व के विरुद्ध तर्कशील चेतना फैलाने का काम किया। वे शिक्षा, संगठन, आत्मसम्मान और तर्कशीलता को समाज परिवर्तन का मार्ग मानते थे। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक क्रांति केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं आती, बल्कि चेतना, सोच और सामाजिक व्यवस्था में बदलाव आवश्यक है।
लगभग 8 दशकों तक सामाजिक और वैचारिक संघर्ष करने के बाद ललई सिंह यादव का परिनिर्वाण 7 फरवरी 1993 को हो गया था। उनके विचार आज भी जीवित हैं। उनकी जयंती केवल एक महान व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि जाति-विहीन, समानतामूलक और तर्कशील समाज के निर्माण का संकल्प लेने का दिन है।
वास्तव में पेरियार ललई सिंह यादव सामाजिक चेतना की वह मशाल थे जिन्होंने वंचित समाज को अपने अधिकार, सम्मान और बराबरी के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी। उनका जीवन हमें सिखाता है कि अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय प्रश्न करना, तर्क करना और परिवर्तन के लिए संघर्ष करना ही सच्ची सामाजिक जिम्मेदारी है।
डॉ. जी. पी. मानव सेवा (निवृत्त उप प्राचार्य केन्द्रीय विद्यालय संगठन, भारत सरकार, नई दिल्ली) संस्थापक एवं वर्तमान अध्यक्ष, मानव विकास संस्थान, उत्तर प्रदेश।

